- अपनी स्कूटी पर लेकर आई, नमाज होने तक बाहर किया इंतजार
- नफरतें कितनी भी फैलाई जाएं, मुहब्बत का बीज अंकुरित ही रहेगा
भोपाल। एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मसाजिद… अलविदा जुमा की गहमागहमी.. हजारों लोगों का जमावड़ा… ऐसे में सबसे अलग नजर आती एक स्टूडेंट सरिता(परिवर्तित नाम)…! नमाज पूरी होने और अपनी सहेली फातेमा(परिवर्तित नाम) के इससे फारिग होकर बाहर आने का इंतजार करती सरिता..!
नमाज पढ़ने जाते और फारिग होकर बाहर आते लोगों की कौतूहल भरी नजरें सरिता पर टिकी हुई थीं…! आखिर वह इस तरह बाहर बैठकर इंतजार क्यों कर रही है…!
मामले में उत्सुकता बढ़ी तो सीनियर जर्नलिस्ट जफर आलम खान ने इसका कारण पूछ ही लिया। सरिता ने बताया कि बात इतनी सी है कि वह और फातेमा एक हॉस्टल में रूममेट हैं। सरिता अपने मजहब का पालन करती है तो फातेमा अपने धर्म को निभाती है। माहे रमजान में फातेमा अपने रोजा, नमाज और इबादत का सिलसिला पूरा कर रही थी। रमजान के आख़िरी जुमा की नमाज अदा करने के लिए उसका मन ताजुल मसाजिद जाने का था। लेकिन समस्या हॉस्टल से मस्जिद की दूरी और गाड़ी न चला पाने की मजबूरी थी। सरिता ने जब इस ख्याल को जाना तो उसने इस काम के लिए अपनी स्कूटी आगे कर दी और चल पड़ी फातेमा को अपने साथ बैठाकर ताजुल मसाजिद। नमाज अदा करने तक वह बाहर बैठकर उसका इंतजार भी करती रही।
सरिता और फातेमा का मानना है कि हम सब ईश्वर की बनाई हुई संतान हैं और एक दूसरे के धर्म को सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। आज सरिता ने फातेमा के लिए कदम बढ़ाए हैं तो कल किसी रूप में फातेमा भी सरिता के लिए पहल कर सकती है। दोनों ने कहा कि हम हिंदुस्तान की धरती रहते हैं और आपसी भाईचारा, प्रेम और विश्वास हमारी विरासत में है। इसे किसी तरह के सियासी फंडे दूषित नहीं कर पाएंगे।

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