भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि “संभावना” का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 22 मार्च रविवार को सुरेन्द्र सिंह मरावी एवं साथी- अनूपपुर द्वारा करमा सैला नृत्य, शिशुपाल सिंह एवं साथी टीकमगढ़ द्वारा मोनिया नृत्य, सुश्री आरती बरकने एवं साथी- खण्डवा द्वारा निमाड़ी गायन, मधुसूदन परमार एवं साथी-इन्दौर द्वारा भजन गायन की प्रस्तुति दी गई।
गतिविधि में मधुसूदन परमार एवं साथी-इन्दौर द्वारा भजन गायन में गौरी का नंद गणेश ने मनाऊं रे खोल भरम को तालो…खोले भरम को तालो रे ज्वाला कर मंदर उजालों…या प्रीत म्हारे लागी रे सांवरिया से मिलवा की…., कानुडा म्हारी सुन ले रे …, एवं सुश्री आरती बरकने एवं साथी- खण्डवा द्वारा निमाड़ी गायन में गौरी गणेश ख मनावांगा…,थारो निर्मल निर्मल पाणी…, सिंगाजी न लियो अवतार…, हम भी चलांगा गाड़ी म बठागा…, लाल लाल बेलिया सवारी की गाड़ी…, जैसे कई गीत एवं भजन की प्रस्तुति दी गई।
मोनिया नृत्य
मोनिया नृत्य बुंदेलखंड का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर किया जाता है। इसमें ग्वाल-बाल मोर पंख, लाठियां और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं। यह भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा से प्रेरित है।
गोण्ड जनजातीय करमा नृत्य
करमा कर्म की प्रेरणा देने वाला नृत्य है।ग्रामवासियों में श्रम का महत्व है श्रम को ही ये कर्म देवता के रूप में मानते हैं। पूर्वी मध्यप्रदेश में कर्म पूजा का उत्सव मनाया जाता है। उसमें करमा नृत्य किया जाता है परन्तु विन्ध्य और सतपुड़ा क्षेत्र में बसने वाले जनजातीय कर्म पूजा का आयोजन नहीं करते। नृत्य में युवक-युवतियाँ दोनों भाग लेते हैं, दोनों के बीच गीत रचना की होड़ लग जाती है। वर्षा को छोड़कर प्रायः सभी ऋतुओं में गोंड जनजातीय करमा नृत्य करते हैं। यह नृत्य जीवन की व्यापक गतिविधि के बीच विकसित होता है, यही कारण है कि करमा गीतों में बहुत विविधता है। वे किसी एक भाव या स्थिति के गीत नहीं है उसमें रोजमर्रा की जीवन स्थितियों के साथ ही प्रेम का गहरा सूक्ष्म भाव भी अभिव्यक्त हो सकता है। मध्यप्रदेश में करमा नृत्य-गीत का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। सुदूर छत्तीसगढ़ से लगाकर मंडला के गोंड और बैगा जनजातियों तक इसका विस्तार मिलता है।
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार दोपहर 2 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा।

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