March 27, 2026

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जंग का असर : भारतीय उद्योगों की रुकी रफ्तार, निचले स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग  

दुनिया के एक कोने में मिसाइल चल रही हैं और बम गिर रहे हैं, लेकिन उसकी तपिश हमारे देश (भारत) में पड़ रही है। जंग की तपिश लुधियाना की टेक्सटाइल यूनिट्स से लेकर अम्बाला की साइंस मार्केट और पानीपत के करघों में महसूस की जा रही है। युद्ध केवल सरहदों पर नहीं लड़ा जाता, उसकी पहली मार अर्थव्यवस्था की नसों पर पड़ती है। मध्य-पूर्व (इजरायल-ईरान) में छिड़े संघर्ष ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत खंभे ‘मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर’ की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। जारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में भारत का मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) गिरकर 53.8 पर आ गया है। यह आंकड़ा पिछले साढ़े चार साल (54 महीने) का सबसे निचला स्तर है।

इस गिरावट का सीधा मतलब यह है कि हमारे कारखानों में माल बनने की रफ्तार धीमी हो गई है, नए ऑर्डर कम मिल रहे हैं और लागत लगातार बढ़ रही है। आखिर सात समंदर पार चल रही जंग ने हमारे घर के बजट और उद्योगों का गणित कैसे बिगाड़ दिया? आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।

क्या है यह PMI का गणित और क्यों बढ़ी चिंता ?
सबसे पहले यह जान लीजिए कि PMI होता क्या है। आसान शब्दों में, यह देश की फैक्ट्रियों की ‘सेहत’ बताने वाला थर्मामीटर है। अगर यह 50 से ऊपर है, तो मतलब सब ठीक है, विकास हो रहा है। लेकिन अगर यह नीचे की तरफ गिर रहा है, तो मतलब अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ रही है। फरवरी में यह 56.9 पर था, जो मार्च में अचानक 53.8 पर आ गया।

इतनी बड़ी गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह है सप्लाई चेन का टूटना। भारत का ज्यादातर व्यापार ‘लाल सागर’ (Red Sea) के रास्ते होता है। युद्ध की वजह से जहाजों को अब ‘केप ऑफ गुड होप’ (अफ्रीका के नीचे से) घूमकर आना पड़ रहा है। इससे न केवल माल पहुंचने में 15 से 20 दिन की देरी हो रही है, बल्कि जहाजों का किराया भी तीन गुना तक बढ़ गया है।

पानीपत की कंबल मार्केट: निर्यातकों की टूटी कमर
हरियाणा का पानीपत शहर, जिसे ‘बुनकरों का शहर’ और दुनिया की ‘कास्ट-ऑफ कैपिटल’ कहा जाता है, इस समय दोहरी मार झेल रहा है। यहाँ के कंबल, दरियाँ और घरेलू साज-सज्जा का सामान पूरी दुनिया में निर्यात होता है, जिसमें खाड़ी देश एक बड़ा हिस्सा हैं।

कंटेनरों का संकट : युद्ध के कारण पानीपत के निर्यातकों के करोड़ों रुपये के कंटेनर बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। शिपिंग लाइनों ने $1500-$2000 के बेस रेट को बढ़ाकर $5000 के पार कर दिया है, जिससे निर्यातकों का मुनाफा पूरी तरह खत्म हो गया है।

पेमेंट्स का अटकना : ईरान और इराक जैसे देशों को माल भेजने वाले कारोबारियों की पेमेंट फंस गई है। अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग गेटवे में अस्थिरता के कारण पैसा आने में देरी हो रही है, जिससे छोटी इकाइयों के पास अगले लॉट के लिए कच्चा माल खरीदने तक के पैसे नहीं बचे हैं।

राइस मिलर्स : बासमती की मिठास पर युद्ध की कड़वाहट
हरियाणा और पंजाब भारत के ‘बासमती बेल्ट’ हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती निर्यातक है और हमारा 70% से ज्यादा चावल मध्य-पूर्वी देशों (ईरान, सऊदी अरब, इराक, यूएई) को जाता है।

  1. ईरान का संकट : ईरान भारतीय बासमती का सबसे बड़ा खरीदार है। युद्ध के डर से ईरान के व्यापारियों ने फिलहाल नए सौदे रोक दिए हैं। कुरुक्षेत्र और करनाल की मंडियों में राइस मिलर्स के पास स्टॉक जमा है, लेकिन खरीदार गायब हैं।
  2. क्वालिटी का जोखिम : चावल को लंबे समय तक समुद्र में नहीं रखा जा सकता। लंबे रास्ते की वजह से शिपिंग में देरी हो रही है, जिससे चावल में नमी और कीड़ा लगने का खतरा बढ़ गया है। यदि यह स्थिति रही, तो आने वाले समय में किसानों को भी धान के उचित दाम मिलने में मुश्किल हो सकती है।

अम्बाला की साइंस मार्केट : कांच और गैस का संकट
अम्बाला कैंट की वैज्ञानिक उपकरण मार्केट (Scientific Instruments Hub) भी इस वैश्विक आग की लपटों से अछूती नहीं है। यहाँ की करीब 2,000 इकाइयाँ अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं।

गैस की किल्लत और भट्ठियां : अम्बाला का ग्लासवेयर उद्योग पूरी तरह से कमर्शियल गैस सिलेंडरों पर निर्भर है। युद्ध के कारण नेचुरल गैस की वैश्विक सप्लाई बाधित हुई है, जिससे गैस की कीमतें 20% तक बढ़ गई हैं। यहाँ के उद्यमी अब अपनी भट्ठियां (Furnaces) पूरी क्षमता से नहीं चला पा रहे हैं।

लागत में भारी इजाफा : कांच, पीतल (Brass) और स्टील जैसे कच्चे माल की कीमतें पिछले 15 दिनों में तेजी से बढ़ी हैं। लागत बढ़ने के कारण अम्बाला के निर्माता पुराने रेट पर सप्लाई देने में असमर्थ हैं, जिससे उनके वैश्विक अनुबंध (Contracts) खतरे में पड़ गए हैं।

कच्चे तेल की उछाल और बढ़ती लागत

इस संकट का दूसरा गंभीर पहलू है कच्चे तेल की कीमतें। मध्य-पूर्व तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें $95 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने को तैयार हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होता है, तो माल को फैक्ट्री से बंदरगाह या बाजार तक लाने का ट्रांसपोर्टेशन खर्च बढ़ जाता है। यही वजह है कि उत्पादकों की ‘इनपुट कॉस्ट’ (लागत) में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

पंजाब : लुधियाना और जालंधर के ‘एक्सपोर्ट’ पर ब्रेक
पंजाब भारत का प्रमुख औद्योगिक राज्य है, जहां लुधियाना का होजरी और जालंधर का स्पोर्ट्स व हैंड टूल्स उद्योग दुनिया भर में मशहूर है। इस युद्ध ने पंजाब के उद्यमियों की रातों की नींद उड़ा दी है।

लुधियाना (होजरी और टेक्सटाइल) : लुधियाना से भारी मात्रा में ऊनी और सूती कपड़े खाड़ी देशों और यूरोप को जाते हैं। युद्ध के कारण वहां से मिलने वाले नए ऑर्डर्स में 30% की कमी आई है। निर्यातकों के करोड़ों रुपये के पेमेंट अटके हुए हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनल (SWIFT) में अनिश्चितता बनी हुई है।

जालंधर (हैंड टूल्स और स्पोर्ट्स) : जालंधर के हैंड टूल उद्योग का सालाना टर्नओवर लगभग 3,000 करोड़ रुपये है। कच्चे माल (स्टील और लोहा) की कीमतों में 20-25% की बढ़ोतरी ने मार्जिन खत्म कर दिया है। निर्यातकों का कहना है कि जो माल 30 दिन में पहुंचता था, उसे अब 50 दिन लग रहे हैं।

साइकिल उद्योग : लुधियाना का साइकिल उद्योग भी कच्चे माल की कमी और रबर की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। स्थानीय एसोसिएशन के मुताबिक, यदि युद्ध अप्रैल तक खिंचा, तो कई यूनिट्स को ‘ले-ऑफ’ (कामबंदी) का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।

हिमाचल : ‘दुनिया की फार्मा राजधानी’ पर लागत का बोझ
हिमाचल प्रदेश का बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (BBN) औद्योगिक क्षेत्र भारत की दवा आपूर्ति की रीढ़ है। यहाँ बनी दवाइयां पूरी दुनिया में जाती हैं, लेकिन अब उत्पादन लागत का संकट खड़ा हो गया है।

कच्चे माल (API) की महंगाई : दवाओं को बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API) का एक बड़ा हिस्सा आयात होता है। सप्लाई चेन टूटने से पैरासिटामोल से लेकर एंटीबायोटिक्स तक का कच्चा माल 40% तक महंगा हो गया है।

पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स : दवाओं की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और फॉयल की कीमतें बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार की ‘प्राइस कंट्रोल’ नीति के कारण दवा कंपनियां अपनी मर्जी से कीमतें बढ़ा नहीं सकतीं, जिससे उनका घाटा लगातार बढ़ रहा है।

एक्सपोर्ट में देरी : बद्दी की करीब 1,000 छोटी-बड़ी फार्मा कंपनियों के कंटेनर बंदरगाहों पर अटके हुए हैं, जिससे लाइफ सेविंग ड्रग्स की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ने का डर है।

चंडीगढ़: लॉजिस्टिक्स और सर्विस सेक्टर पर असर
चंडीगढ़ कोई औद्योगिक हब नहीं है, लेकिन यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा सर्विस और लॉजिस्टिक्स केंद्र है। यहाँ से पूरे क्षेत्र के व्यापार का संचालन और वित्त पोषण (Financing) होता है।

आईटी और बैंकिंग : चंडीगढ़ और मोहाली के आईटी हब पर इस युद्ध का ‘मनोवैज्ञानिक’ असर पड़ा है। विदेशी क्लाइंट्स ने प्रोजेक्ट्स के विस्तार पर फिलहाल रोक लगा दी है।

लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट : चंडीगढ़ स्थित बड़ी ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए तेल की बढ़ती कीमतें सिरदर्द बन गई हैं। शहर में माल ढुलाई के रेट्स में 10-12% की बढ़ोतरी देखी गई है, जिसका असर फल, सब्जी और राशन की कीमतों पर पड़ना तय है।

शेयर बाजार और निवेश : चंडीगढ़ के स्थानीय निवेशकों ने पिछले एक सप्ताह में सुरक्षित निवेश (गोल्ड) की ओर रुख किया है, जिससे इक्विटी मार्केट में पूंजी की कमी देखी जा रही है।

विशेषज्ञों की राय और समाधान
आर्थिक विशेषज्ञों और सीआईआई (CII) जैसे व्यापार मंडलों ने केंद्र सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें हैं:

निर्यातकों को फ्रेट सब्सिडी : समुद्री किराये में हुई बढ़ोतरी की भरपाई के लिए सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए।

वैकल्पिक व्यापार मार्ग : खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य अंतरराष्ट्रीय रास्तों को सुगम बनाया जाए।

MSME को ब्याज में छूट : छोटी इकाइयों को वर्तमान संकट से उबारने के लिए ब्याज मुक्त ऋण या वर्किंग कैपिटल की सुविधा मिले।

भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल एक ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। वैश्विक शांति ही अब उत्तर भारत के इन उद्योगों की जान बचा सकती है। यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो इसका असर सीधे आपकी और हमारी जेब पर महंगाई के रूप में पड़ेगा।

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