नई दिल्ली
पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने अचानक नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) के तहत संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन से संबंधित तैयारी शुरू की. उसने इसके लिए विपक्ष से सहयोग मांगा है. बताया यह जा रहा है कि विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाकर संविधान संशोधन विधेयक पारित किया जायेगा. इसमें कई सारे कदम उठाये जाने की बात कही गयी है. जैसे-संविधान संशोधन से लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाने वाली हैं, जिनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जायेंगी.
इसके अलावा, सरकार ने परिसीमन को 2026-27 के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर कराने का फैसला किया है. इसके पीछे तर्क यह है कि नयी जनगणना होने और उसका आंकड़ा आने में इतना समय लग जायेगा कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक परिसीमन नहीं हो पायेगा. एक और प्रस्ताव यह है कि संशोधन से राज्यों में सीटों की वृद्धि का अनुपात नहीं बदलेगा. जबकि पहले ऐसा माना जा रहा था कि कम जनसंख्या होने के कारण दक्षिण भारत के राज्यों को खामियाजा भुगतना पड़ेगा.
इस कारण दक्षिण के नेता क्षुब्ध थे. लेकिन नये प्रस्ताव के मुताबिक, परिसीमन से उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर अगर 120 हो जायेंगी, तो तमिलनाडु में भी लोकसभा सीटों में वृद्धि इसी अनुपात में होगी. परिसीमन के मुद्दे पर लंबे समय से उत्तर बनाम दक्षिण का न सिर्फ द्वंद्व छिड़ा हुआ था, बल्कि दक्षिण के राज्यों को लगता था कि जनसंख्या को नियंत्रित रखने का उन्हें दंड दिया जा रहा है, जबकि ज्यादा आबादी वाले उत्तर भारत के राज्यों को परिसीमन के जरिये बड़ा राजनीतिक लाभ मिलेगा. लेकिन नये प्रस्ताव में यह आशंका दूर हो गयी है.
2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराकर दक्षिण की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश
दरअसल, परिसीमन मुद्दे पर एनडीए में भाजपा के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू तक का रवैया नाराजगी भरा था, और वैसे में, दक्षिण भारत में भाजपा के लिए अपना विस्तार कर पाना कठिन होता, इसलिए 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराकर दक्षिण की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश है. दरअसल, 19 सितंबर, 2023 को जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) संसद से पारित हुआ था, तब इसे जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन और 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने की घोषणा की गयी थी. लेकिन अब सरकार ये दोनों कार्य संविधान संशोधन के जरिये करना चाहती है. संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है. इसके अलावा, आधे राज्यों को इसे पारित कराना होगा. बेशक मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे पारित कराना आसान नहीं है. लेकिन विपक्षी दल महिला आरक्षण का विरोध भी नहीं कर पायेंगे.
अगर संसद के विशेष सत्र में इस पर मुहर लग जाती है, तो फिर परिसीमन आयोग बैठेगा, और उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले वर्ष तक महिला आरक्षण लागू हो जायेगा. हालांकि यह सवाल उठाया जा रहा है कि महिला आरक्षण को अगर 2011 की जनगणना और परिसीमन के आंकड़ों पर ही लागू करना था, तो इसे पहले भी लाया जा सकता था. लेकिन सरकार अब अचानक यह कदम उठाने जा रही है, तो कुछ सोच-समझकर ही उठा रही होगी. दरअसल, अगले साल तीन राज्यों-उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ये चुनाव, जाहिर है कि भाजपा और एनडीए के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं.
अगर अगले साल तक महिला आरक्षण लागू हो जाता है, तो इन तीनों राज्यों में भाजपा को चुनावी लाभ मिलना तय है. फिर 2029 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को इसका लाभ मिलेगा. हालांकि फिलहाल यह प्रस्ताव है, और काफी जटिल भी है. कई प्रश्नों के जवाब अभी तक नहीं मिले हैं. जैसे परिसीमन के बाद लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित हो जायेंगी. लेकिन ये सीटें किस तरह आरक्षित होंगी, इस बारे में अभी कुछ तय नहीं है. सवाल यह भी है कि परिसीमन जब 2011 की जनगणना के आधार पर ही होना है, तो फिर 2026-27 की जनगणना के आधार पर नये सिरे से परिसीमन कराने का क्या औचित्य होगा. फिलहाल लगता है कि पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए सरकार ने यह दांव चला है.
दरअसल युद्ध का लंबा असर रहने वाला है, और हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव भी लंबे समय तक रहेगा. इस कारण आय से लेकर रोजगार तक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में, महिला आरक्षण लागू कर सरकार महिलाओं का एकमुश्त वोट अपने साथ होने की उम्मीद कर सकती है. इस मामले में दो बातों पर ध्यान देना चाहिए. एक यह कि चुनावों में महिला वोटरों की भूमिका अब पुरुष वोटरों के बराबर या उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगी है. इसके अलावा, महिलाओं का बड़ा वर्ग पहले से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के साथ है. ऐसे में, अगर मान लें कि युद्ध के असर से युवा वर्ग सरकार से नाराज हो जाये, तो उसका चुनावी नतीजे पर बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है. इसके अलावा, परिसीमन चूंकि 2011 के आंकड़े पर ही होना है, ऐसे में, दक्षिण भारत के नेता खुश हैं, और वहां भाजपा को नाराजगी का सामना भी नहीं करना पड़ेगा.
लेकिन इस कदम को सिर्फ चुनावी राजनीति के चश्मे से देखना सही नहीं होगा. लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण लागू हो जाता है, तो यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी उपलब्धि होगा. हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि महिला आरक्षण के कारण जिन पुरुष राजनेताओं को अपनी सीटें गंवानी पड़ेंगी, वे आरक्षित सीटों पर अपनी महिला रिश्तेदारों को बिठा सकते हैं. और बहुत संभव है कि इसे राजनीतिक बुराई के तौर पर ही देखा जाये.
महिला आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियों में जागृति और आत्मविश्वास की भावना आयी है
लेकिन पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिला आरक्षण लागू होने के बाद हमने देखा है कि भले ही अनेक जगहों पर वास्तविक ताकत अब भी महिला प्रमुखों के पतियों के पास ही हो, लेकिन महिला आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियों में जागृति और आत्मविश्वास की भावना आयी है. और अब वे राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में अपनी जगह लेने के लिए तैयार हैं. इस लिहाज से महिला आरक्षण भारतीय राजनीति को बदलने के साथ-साथ उसमें नयी ऊर्जा भर सकता है. संसद और विधानमंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ने पर वे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका जैसे मुद्दों पर नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगी, जिसका समाज पर निश्चित रूप से सकारात्मक असर पड़ेगा.

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