September 11, 2026

Udaan Publicity

The Voice of Democracy

‘साइलेंट किलर’ बन रही लिवर की बीमारियां, युवाओं पर ज्यादा संकट

भारत में खराब जीवनशैली के कारण लिवर की बीमारियां ‘साइलेंट किलर’ बन गई हैं। इलाज का खर्च दोगुना होने से अब लोगों के लिए पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस और जागरूकता बेहद जरूरी है।

World Liver Day 19 April : भारत में लिवर से जुड़ी बीमारियां अब एक ऐसी ‘खामोश महामारी’ का रूप ले चुकी हैं, जो धीरे-धीरे युवाओं और छोटे शहरों को अपनी चपेट में ले रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश की करीब 9% से 32% आबादी ‘नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज’ (NAFLD) से जूझ रही है। यानी हर तीन में से एक शख्स इस समस्या का सामना कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले तीन सालों में लिवर रोगों के इलाज के लिए होने वाले इंश्योरेंस क्लेम में 100% की भारी बढ़ोतरी देखी गई है, जो इस स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को साफ बयां करती है।

केयर हेल्थ इंश्योरेंस की नई रिपोर्ट बताती है कि लिवर की बीमारियों का दायरा अब सिर्फ बड़े शहरों या बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ल्ड लिवर डे के मौके पर जारी किए गए इस रिपोर्ट के मुताबिक, अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में हर साल इन बीमारियों के मामलों में 10 से 15 प्रतिशत का इजाफा हो रहा है। वहीं, युवाओं में भी लिवर खराब होने की दर सालाना 5 से 10 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है।

जेब पर भारी पड़ता लिवर का इलाज
लिवर की बीमारियों से लड़ना न केवल शारीरिक बल्कि आर्थिक रूप से भी कमर तोड़ देने वाला साबित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन सालों में इन बीमारियों के इलाज का खर्च लगभग 100% तक बढ़ गया है। आज के समय में जिस तरह इलाज की प्रक्रिया मुश्किल हुई है, उसे देखते हुए अब कम से कम 15 लाख रुपये या उससे अधिक का हेल्थ कवर एक बुनियादी जरूरत बन गया है। अगर किसी के पास पर्याप्त बीमा सुरक्षा नहीं है, तो लिवर का इलाज मध्यमवर्गीय परिवार को कर्ज के जाल में धकेल सकता है।

केयर हेल्थ इंश्योरेंस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर मनीष डोडेजा का कहना है कि लिवर की बीमारियों का बढ़ता ग्राफ अब केवल एक मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक संकट भी बनता जा रहा है। उन्होंने जोर दिया कि जिस तरह से जोखिम बढ़ रहा है, लोगों को समय-समय पर अपने हेल्थ कवर की समीक्षा करनी चाहिए ताकि वह बढ़ते इलाज के खर्चों के साथ तालमेल बिठा सके।

महिलाओं और बच्चों पर मंडराता खतरा
भले ही लिवर की बीमारियां अभी भी पुरुषों में अधिक देखी जाती हैं, लेकिन महिलाओं में इसके मामले सालाना करीब 10% की दर से बढ़ रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति बच्चों की है। वर्ल्ड ओबेसिटी ऑब्जर्वेटरी के अनुमान के मुताबिक, अगर मौजूदा जीवनशैली और खान-पान की आदतें नहीं बदलीं, तो साल 2040 तक भारत के लगभग 1.19 करोड़ बच्चे लिवर की किसी न किसी बीमारी के साथ जी रहे होंगे।

मोटापा और खराब मेटाबॉलिज्म बच्चों में ‘क्रोनिक लिवर डिजीज’ की मुख्य वजह बनकर उभर रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि खान-पान में लापरवाही और फिजिकल एक्टिविटी की कमी इस संकट को और गहरा कर रही है। सरकार ने राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD) के तहत फैटी लिवर की स्क्रीनिंग शुरू तो की है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक लोग खुद जागरूक होकर समय पर जांच और सही तैयारी नहीं करेंगे, तब तक इस ‘साइलेंट एपिडेमिक’ से लड़ना मुश्किल होगा।

Spread the love