May 19, 2026

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हर नाइंसाफ़ी का अचूक अस्त्र : शिक्षा, एकता और लोकतांत्रिक संघर्ष

आज का भारतीय मुसलमान एक अजीब दोराहे पर खड़ा दिखाई देता है। एक तरफ वह इस मुल्क की मिट्टी, तहज़ीब, आज़ादी की लड़ाई और तरक़्क़ी का बराबर का हिस्सेदार है, तो दूसरी तरफ उसके भीतर यह एहसास बढ़ता जा रहा है कि उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमज़ोर की जा रही है। अदालतों से इंसाफ मिलने में देरी, पुलिस-प्रशासन के रवैये पर उठते सवाल, और सियासी नुमाइंदगी का लगातार कम होना—ये सब बातें मुस्लिम समाज के अंदर बेचैनी और मायूसी पैदा कर रही हैं।

पहले बाबरी मस्जिद का फैसला और अब कमाल मौला मस्जिद के फैसले से बड़ी तादाद में मुसलमानों को यह महसूस हुआ है कि तमाम तारीख़ी दस्तावेज़, सुबूत और दलीलें उनके हक़ में होने के बावजूद अदालतों ने बहुसंख्यक आस्था और भावनाओं को अधिक महत्व दिया। इसी वजह से मुस्लिम समाज के अंदर गुस्सा, बेचैनी और मायूसी बढ़ी है। बहुत से लोगों को लगता है कि जब इतने बड़े और संवेदनशील मामलों में भी उनकी बात पूरी तरह नहीं सुनी जाती, तो आम मुसलमान को इंसाफ कैसे मिलेगा।

आज बहुत से मुसलमानों को लगता है कि अगर किसी मसले पर उनके साथ नाइंसाफी होती है, तो उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। कई मामलों में यह शिकायत सामने आती है कि पुलिस प्रशासन निष्पक्ष व्यवहार करने की बजाए उल्टा प्रताड़ित करता है या शिकायत को गंभीरता से नहीं लेता। अदालतें लोकतंत्र का सबसे बड़ा सहारा मानी जाती हैं, लेकिन जब फैसलों में लंबा वक्त लगता है या आम आदमी को अपनी बात रखने में मुश्किल महसूस होती है, तो भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।

सिर्फ यही नहीं, सियासत में भी मुसलमानों की मौजूदगी लगातार घटती जा रही है। जो पार्टियां खुलकर साम्प्रदायिक राजनीति करती हैं, उनसे तो उम्मीद कम ही रहती है, लेकिन चिंता तब और बढ़ती है, जब खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां भी मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक समझने लगें। चुनाव के वक्त इनसे 80% तक वोट की उम्मीद की जाती है, लेकिन टिकट देने की बारी आती है तो मुसलमानों की हिस्सेदारी बेहद कम दिखाई देती है। पार्टी संगठन में भी बड़े पदों पर मुस्लिम चेहरों की संख्या लगातार घट रही है।

ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि मुसलमान क्या करे? क्या वह मायूस होकर किनारे बैठ जाए? क्या वह खुद को इस मुल्क से अलग महसूस करने लगे? इसका जवाब हरगिज़ नहीं है।

भारत का मुसलमान इस देश का उतना ही मालिक है, जितना कोई और नागरिक। यह मुल्क संविधान से चलता है और संविधान हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देता है। मुश्किल हालात ज़रूर हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज ने शिक्षा, एकता और लोकतांत्रिक संघर्ष का रास्ता अपनाया है, उसने अपनी जगह बनाई है।

आज मुस्लिम समाज को सबसे पहले तालीम पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। सिर्फ धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा, कानून, प्रशासन, मीडिया, टेक्नोलॉजी और राजनीति में भी अपनी मजबूत मौजूदगी बनानी होगी। जो समाज पढ़ता है, वही अपनी बात ताकत से रख पाता है।

दूसरी अहम बात यह है कि भावनात्मक नारों से ज्यादा संगठित सामाजिक काम की जरूरत है। मोहल्लों में लीगल हेल्प सेंटर, एजुकेशनल ट्रस्ट, स्कॉलरशिप नेटवर्क और सामाजिक संस्थाएं मजबूत करनी होंगी। अगर कहीं नाइंसाफी होती है तो उसका जवाब कानून और लोकतांत्रिक तरीके से दिया जाना चाहिए।

सियासत में भी सिर्फ शिकायत करने से बात नहीं बनेगी। मुस्लिम समाज को खुद अपने बीच से पढ़े-लिखे, ईमानदार और दूरदर्शी नेतृत्व को आगे लाना होगा। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक अपनी भागीदारी बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। लोकतंत्र में जो समाज राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाता है, उसकी आवाज़ भी कमजोर पड़ने लगती है।

इसके साथ-साथ दूसरे समुदायों से रिश्ते बेहतर बनाना भी बेहद जरूरी है। नफरत की राजनीति तभी कामयाब होती है जब समाज आपस में दूर हो जाए। आम हिन्दू और मुसलमान सदियों से साथ रहते आए हैं, उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी, दुख-सुख और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए संवाद और भाईचारा बनाए रखना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

मुसलमानों को यह समझना होगा कि मायूसी कोई हल नहीं है। मुश्किल दौर हमेशा नहीं रहते। अगर समाज सब्र, तालीम, एकता और लोकतांत्रिक संघर्ष का रास्ता अपनाए, तो हालात बदले भी जा सकते हैं और बेहतर भी बनाए जा सकते हैं। भारत का संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक ताना-बाना आज भी उम्मीद की सबसे बड़ी वजह हैं।

ज़फ़र आलम ख़ान ✍️
(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट, विचारक और डिबेटर हैं। लेखक के निजी और स्वतंत्र विचार हैं।)

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