सरकार निजी बस और ट्रक ऑपरेटरों को इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने के लिए बड़ी प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है, ताकि तेल आयात पर निर्भरता और प्रदूषण दोनों को कम किया जा सके।
भारत सरकार ऊर्जा संकट के बीच प्राइवेट सेक्टर में इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों को बढ़ावा देने के लिए 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपये) से अधिक की प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है। इस योजना का मकसद कॉमर्शियल परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जानकारी मामले से जुड़े लोगों ने दी है।
नाम जाहिर न करने की शर्त पर मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि यह प्रोग्राम 10 वर्षों तक चलेगा और मुख्य रूप से भारत के प्राइवेट ओन्ड कॉमर्शियल फ्लीट को टारगेट करेगा। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा इंटर-सिटी बस ऑपरेटरों के लिए रखा जा सकता है। योजना को अंतिम रूप देने के लिए इस महीने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और इंडस्ट्री से जुड़े पक्षों के साथ बैठकें होने की संभावना है। अंतिम बजट आवंटन, प्रोत्साहन पाने वाले वाहनों की श्रेणी और सब्सिडी ढांचे पर अभी काम चल रहा है और इसमें बदलाव संभव है।
पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता घटाने पर फोकस
पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधाओं के बाद भारत सरकार जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल आदि) पर निर्भरता घटाने के प्रयास तेज कर रही है। इससे ऊर्जा सुरक्षा और आयातित महंगाई को लेकर चिंताएं फिर बढ़ गई हैं। भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, जिससे वह वैश्विक भू-राजनीतिक संकट और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
कमर्शियल ट्रांसपोर्ट का इलेक्ट्रिफिकेशन भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने में भी मदद करेगा। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन के अनुसार नई दिल्ली जैसे शहरों में वाहनों से होने वाला उत्सर्जन सालाना सूक्ष्म कण प्रदूषण (PM) का लगभग 40 प्रतिशत तक योगदान देता है। पिछले पांच वर्षों में इलेक्ट्रिक बसों को अपनाने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है, जिसमें सरकारी परिवहन कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि भारत में अभी भी ज्यादातर नई बसें डीजल से चलती हैं।
हालांकि डीजल पर निर्भरता केवल भारत की समस्या नहीं है, लेकिन चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे क्षेत्र कमर्शियल वाहनों के इलेक्ट्रिफिकेशन में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। चीन में पहले से ही लाखों इलेक्ट्रिक ट्रक और बसें चल रही हैं, जबकि अमेरिका और यूरोप शहरी लॉजिस्टिक्स और पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्लीट को तेजी से इलेक्ट्रिक बना रहे हैं।
चर्चा में शामिल अनुमानों के अनुसार भारत में 20 लाख से अधिक बसें हैं, लेकिन इनमें से केवल 5 प्रतिशत बसों पर सरकार का नियंत्रण है। वहीं देश में लगभग सभी ट्रक निजी क्षेत्र द्वारा संचालित किए जाते हैं और यही डीजल की सबसे बड़ी खपत करते हैं।
छोटे कॉमर्शियल वाहन भी होंगे इलेक्ट्रिक!
उन्होंने बताया कि अधिकारी छोटे कमर्शियल फ्लीट ऑपरेटरों को इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं। ये ऑपरेटर ऊंची शुरुआती लागत और सीमित वित्तपोषण के कारण कठिनाई का सामना कर रहे हैं।
विचाराधीन प्रोत्साहनों में वाहन की पूरी अवधि के दौरान प्रति वाहन 15 लाख रुपये तक का ब्याज सब्सिडी लाभ शामिल हो सकता है, जिसे समय के साथ धीरे-धीरे कम किया जाएगा। सरकार प्राइवेट कंपनियों को इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहन खरीदने के लिए वित्तपोषण उपलब्ध कराने हेतु आंशिक क्रेडिट गारंटी व्यवस्था पर भी विचार कर रही है।
चर्चा में कौन-कौन शामिल
उन्होंने बताया कि इस परामर्श प्रक्रिया में बैंक, गारंटी प्रदाता, वाहन निर्माता और फ्लीट ऑपरेटर शामिल हैं। शुरुआती चर्चाओं में 10,000 बसों के लिए सहायता देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसे आगे बढ़ाकर 40,000-50,000 वाहनों तक किया जा सकता है। इंडस्ट्री ने चार्जिंग पार्क, टोल और टैक्स छूट तथा सस्ती बिजली जैसी सुविधाओं की भी मांग की है, ताकि परिचालन लागत कम की जा सके।
भारत सरकार के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्रोत्साहन कार्यक्रमों की देखरेख करने वाले भारी उद्योग मंत्रालय ने इस पर टिप्पणी के अनुरोध का तत्काल जवाब नहीं दिया।

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