नई दिल्ली। भारतीय बैंकों ने लोन ग्रोथ के लिए ज्यादा फंड उपलब्ध कराने के मकसद से रिजर्व बैंक से लिक्विडिटी नियमों में ढील देने का अनुरोध किया है। समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने बैंकिंग सेक्टर से जुड़े सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी। सूत्रों ने बताया कि बैंकों में जमा की तुलना में कर्ज की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे फंडिंग पर दबाव बना हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकों ने आरबीआई से उस नकदी का कुछ हिस्सा उपयोग करने की अनुमति मांगी है, जिसे उन्हें अल्पकालिक वित्तीय दबाव की स्थिति के लिए केंद्रीय बैंक के पास रखना होता है। इस मामले पर पिछले दो हफ्तों के दौरान आरबीआई और कई बैंकों के बीच बैठकें हुई हैं।
बढ़ती क्रेडिट मांग से बैंकों पर दबाव
इन बातचीतों से यह साफ होता है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में कर्ज की बढ़ती मांग को बनाए रखना बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। घरों की बचत शेयर बाजार में जा रही है, जिससे बैंकों के पास जमा होने वाले पारंपरिक फंड घट रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर नकद आरक्षित अनुपात (CRR) के तहत रखी गई राशि के बड़े हिस्से को लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) की गणना में शामिल करने की अनुमति मिलती है, तो बैंकों के पास कर्ज देने के लिए ज्यादा फंड उपलब्ध होंगे और उधारी की लागत कम करने में मदद मिलेगी।
लिक्विडिटी नियमों को जल्द लागू करने की मांग
इसके अलावा, बैंकों ने आरबीआई से यह भी अनुरोध किया है कि संशोधित लिक्विडिटी नियमों को पहले लागू करने पर विचार किया जाए। इन नियमों के तहत बैंकों को सरकारी बॉन्ड कम रखने की अनुमति मिलेगी, जिससे कर्ज देने के लिए और ज्यादा नकदी मुक्त हो सकेगी। सूत्रों ने बताया कि ये नए नियम 1 अप्रैल से लागू होने हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि बैंक चाहते हैं कि आरबीआई इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड की न्यूनतम परिपक्वता अवधि को सात साल से घटाए। इससे बैंकों को इन बॉन्ड के जरिए ज्यादा फंड जुटाने में मदद मिलेगी।
जमा से तेज लोन ग्रोथ
केंद्रीय बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 15 जनवरी तक सालाना आधार पर बैंक जमा 10.6% बढ़े, जबकि इसी अवधि में लोन ग्रोथ 13.1% रही। वहीं, बैंकों द्वारा अल्पकालिक फंड जुटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तीन महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट पर ब्याज दर बुधवार को 6.98% रही, जो समान अवधि के सरकारी ट्रेजरी बिल की यील्ड से काफी ज्यादा है।

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