C.P. Rajendran, delhi
हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात राज्य में लगभग सात सौ किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। इस पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में थार रेगिस्तान और पूर्व में मालवा पठार है। यहां से बनास, लूनी, साखी और साबरमती जैसी नदियां निकलती हैं। इसकी सबसे ऊंची चोटी राजस्थान में माउंट आबू के पास 1,722 मीटर ऊंचा गुरु शिखर है। ऐतिहासिक रूप से, अरावली के पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों से मारवाड़ और मेवाड़ के अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्र बने, जिनसे मारवाड़ी और मेवाड़ी समुदायों का विकास हुआ। यहीं नहीं, रायसीना की पहाड़ियों पर स्थित भारत का राष्ट्रपति भवन भी अरावली पर्वतमाला का ही हिस्सा है।
अरावली पर्वतमाला उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला के साथ-साथ कैम्ब्रियन से पहले के काल (लगभग 3.6 से 0.6 अरब साल पूर्व) के विकास का लगभग तीन अरब साल (3 Ga) का प्राकृतिक दस्तावेज भी है। यह भूवैज्ञानिक इतिहास तीन मुख्य क्रोनो-स्ट्रैटिग्राफिक (उम्र के सापेक्ष चट्टान की परतें) भूभाग यानी बेसमेंट बैंडेड ग्नाइसिक कॉम्प्लेक्स, अरावली सुपरग्रुप और दिल्ली सुपरग्रुप से मिलकर बना है। हर भूभाग में क्रेटन (भूपर्पटी) के निर्माण, घाटियों और दर्रों के विकास, गड्ढों, पिघली हुई चट्टानों की गतिशीलता, चट्टान के नई किस्मों में बदलना और आर्थिक रूप से मूल्यवान खनिजों के बनने का खास भूवैज्ञानिक इतिहास शामिल है।
इस तरह, अरावली पर्वत श्रृंखला प्रोटेरोजोइक युग (2.5 से 0.5 अरब साल पहले) के दौरान बनी धरती की सबसे पुरानी जीवित पर्वत प्रणाली है। यह नए हिमालय से अलग भूवैज्ञानिक अवशेष है। यह धरती की कुछ सबसे शुरुआती टेक्टोनिक प्रक्रियाओं (जिससे भूकंप आते हैं, ज्वालामुखी फटते हैं और पहाड़ बनते हैं) को दिखाती है और कठोर महाद्वीपीय “बैकस्टॉप” के रूप में काम करती है। बाद के काल में इसी प्राचीन क्रेटोनिक खंड ने हिमालय से टकराव के समय स्थिर किनारे के रूप में काम कर उत्तर भारत की भू-संरचना के निर्माण में योगदान दिया।
भारतीय क्रेटॉन (“प्रोटो-इंडिया” यानी भारतीय-भूभाग की मुख्य विशेषताएं) अरबों सालों में पुरानी प्लेट टेक्टोनिक प्रक्रियाओं से बना है। यह कई कैम्ब्रियन-पूर्व क्रेटोनिक न्यूक्लिआई (केंद्र) का मिला-जुला रूप है जो स्यूचर जोन, रिफ्ट और गतिशील पट्टियों से अलग हुआ था और लगभग 2.5 Ga तक बड़े स्थिर संरचना का रूप ले लिया था। इंडियन शील्ड बनाने वाले मुख्य क्रेटॉनिक न्यूक्लिआई (माइक्रोप्लेट्स) हैं: धारवाड़ क्रेटॉन (पश्चिमी और पूर्वी धारवाड़ में बंटा हुआ), सिंहभूम क्रेटॉन, बस्तर क्रेटॉन और अरावली-बुंदेलखंड क्रेटॉन (अरावली और बुंदेलखंड में बंटा हुआ)।
“प्रोटो-इंडिया” का बनना कई चरणों वाली प्रक्रिया थी जो पुरानी प्लेट टेक्टोनिक्स से हुई, जिसमें आर्क एक्रीशन (द्वीप के चापों का जुड़ना), अंतर-महाद्वीपीय टक्कर और मैग्मैटिज्म (पिघली हुई चट्टानों की हलचल), मेटामॉर्फिज्म (नए तरह की चट्टानों में बदलना) और डिफॉर्मेशन (बदलाव) के बार-बार होने वाली घटनाएं शामिल थी।
प्राचीन पर्वतमाला

यह दीर्घकालिक पर्वत-निर्माण प्रक्रिया (ओरोजेनी) भारत के कई प्रमुख प्रीकैम्ब्रियन वलित (फोल्ड) पट्टियों में दर्ज है। अरावली–दिल्ली पट्टी का निर्माण सतपुड़ा पट्टी, सेंट्रल इंडिया टेक्टोनिक जोन, पूर्वी घाट मोबाइल बेल्ट और सर्दन ग्रैन्यूलाइट भूभाग के निर्माण के समकालीन था। इन सभी पट्टियों में मुख्यतः प्रोटेरोजोइक महायुग (लगभग 2,500 से 538 मिलियन साल पहले) के दौरान अनेक बार महाद्वीपीय टक्कर, सबडक्शन और क्रेटोनिक एक्रीशन हुए।
पर्वत बनने की यह लंबी प्रक्रिया कई प्रमुख भारतीय प्रीकैम्ब्रियन फोल्ड बेल्ट में दर्ज है। अरावली-दिल्ली बेल्ट का निर्माण सतपुड़ा बेल्ट, सेंट्रल इंडियन टेक्टोनिक जोन, ईस्टर्न घाट मोबाइल बेल्ट और सदर्न ग्रैनुलाइट टेरेन के निर्माण के साथ ही हुआ था। इन सभी पट्टियों में मुख्यतः प्रोटेरोजोइक महायुग (लगभग 2,500 से 538 मिलियन साल पहले) के दौरान महाद्वीपीय टक्कर, सबडक्शन और क्रेटोनिक संयोजन के अनेक चक्र घटित हुए।
नतीजतन, ये पट्टियां प्राचीन स्यूचर जोन का प्रतिनिधित्व करती हैं। यानी प्रीकैम्ब्रियन काल की प्लेट टेक्टोनिक प्रक्रियाओं के वे निशान, जिनके जरिए आखिरकार प्रायद्वीपीय भारत की स्थिर भू-संरचना अस्तित्व में आई। बाद में यह मजबूत क्रेटॉन कोलंबिया, रोडिनिया और गोंडवाना जैसे महाद्वीपीय सुपरकॉन्टिनेंट (अधिमहाद्वीप) के बनने और टूटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।
ऐसा माना जाता है कि अरावली पर्वतमाला आम तौर पर मेसोप्रोटेरोजोइक काल (1600 से 1000 मिलियन साल पहले) के दौरान बुंदेलखंड और मारवाड़ क्रेटॉन के टकराने से बनी है। इसकी पूर्वी सीमा ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट (GBF) और विंध्य घाटी से तय होती है, जिसके तट पर बुंदेलखंड क्रेटॉन है। दक्षिण में, इसकी सीमा सोन-नर्मदा-ताप्ती से तय होती है, जो मध्य भारतीय टेक्टोनिक जोन की उत्तरी सीमा को दिखाती है। अरावली और विंध्य पर्वतमालाएं रणथंभौर में एक-दूसरे से मिलती हैं, जहां सवाई माधोपुर शहर के पास यूनेस्को में शामिल किला है।
भूवैज्ञानिकों ने अरावली पर्वतमाला के विकास के लिए जियोलॉजिकल टाइमलाइन बनाई है। पहला बड़ा टेक्टोनिक चक्र लगभग 2.2 से 2.1 अरब साल पहले शुरू हुआ था, जब मेवाड़ क्रेटॉन के अंदर खिंचाव हुआ। इससे ज्वालामुखी फूटा, जो प्रारंभिक टूट और महासागरीय बेसिन के निर्माण का संकेत था।
यह महासागर लगभग 1.8 से 1.7 अरब साल पहले तक अस्तित्व में रहा, जब टेक्टोनिक ताकतों की दिशा उलटी हो गई। घाटी के बंद होने से दबाव पड़ा, जिसके चलते जमा हुआ मलबा और ज्वालामुखी की परतें मुड़कर फोल्ड बेल्ट बन गईं, जिससे ग्रेनाइटिक पिघलन (मेल्ट) हुआ। इस घटना से यह चक्र समाप्त हुआ और क्षेत्र में पहली पर्वत (ओरोजेनिक) संरचना अस्तित्व में आई।
अरावली फोल्ड बेल्ट के स्थिर हो जाने के बाद, इसके पश्चिम में दूसरी बड़ी दरार पड़ी, जिससे दिल्ली बेसिन का निर्माण हुआ। इस बेसिन का दीर्घकालिक और जटिल टेक्टोनिक इतिहास रहा, जिसमें सेडिमेंटेशन, ज्वालामुखीय गतिविधियां और आखिरकार उसका बंद होना शामिल था, जिसके चलते यह पर्वत-श्रृंखला में विकसित हो गया। लगभग एक अरब वर्ष तक चली यह प्रक्रिया 700 मिलियन साल पहले खत्म हुई और इसके फलस्वरूप प्राचीन अरावली पर्वत प्रणाली के पश्चिमी विस्तार के रूप में अपेक्षाकृत युवा दिल्ली फोल्ड बेल्ट अस्तित्व में आया।
अब डीप टाइम और समकालीन खतरों के बीच केंद्रीय टकराव उभर सामने आया है। अरबों सालों तक टिके रहने के बाद, प्राचीन अरावली पर्वतमाला आज बिल्कुल नए, मानव-जनित खतरों का सामना कर रही है। जहां कटाव और मलबे के जमा होने जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं ने इन पहाड़ियों को लाखों सालों में धीरे-धीरे आकार दिया। वहीं मानव गतिविधियां अब इनके धीरे-धीरे खत्म होने को नाटकीय रूप से तेज कर रही हैं। यह तथ्य हैरान करने वाला है कि इंसान दुनिया की सभी नदियों द्वारा मिलाकर ले जाए गए पदार्थ से 24 गुना अधिक सामग्री को स्थानांतरित कर देता है। मानव जाति पृथ्वी की सतह पर प्रमुख भू-आकृतिक शक्ति बन चुकी है, जो पैमाने और गति दोनों में प्राकृतिक प्रक्रियाओं से आगे निकल गई है। यह बदलाव ही ‘एन्थ्रोपोसीन’ की अवधारणा का सार है, जो हमारे समय को समझने के लिए सशक्त सांस्कृतिक और वैज्ञानिक ढांचा बना हुआ है।
ऊंचाई की सीमा से कमजोर होता संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की अगुवाई में एक समिति बनाई गई। समिति ने विवादास्पद कदम उठाते हुए रिचर्ड मर्फी भू-आकृति वर्गीकरण प्रणाली के आधार पर यह तय करने के लिए नया “ऊंचाई मानक” तय किया है कि किसी भू-आकृति को अरावली का हिस्सा माना जाए या नहीं। इसके अनुसार स्थानीय भू-उत्थान (लोकल रिलीफ) से 100 मीटर से ज्यादा ऊंचा होना अनिवार्य होगा। इस मानक को अरावली क्षेत्र के सभी राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात) में समान रूप से लागू करने का प्रस्ताव है। यह वर्गीकरण राजस्थान सरकार द्वारा साल 2006 से औपचारिक रूप से अपनाया जा चुका है जो 2002 की राज्य-स्तरीय समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।
अन्य भू-आकृति वर्गीकरणों की तरह, अलग-अलग मानकों का इस्तेमाल करने वाली रिचर्ड मर्फी की वर्गीकरण प्रणाली पृथ्वी की सतही विशेषताओं को समझने के लिए व्यापक और श्रेणीबद्ध ढांचा प्रदान करती है। यह तीन स्वतंत्र चरों (वैरिएबल) को एक साथ लाती है: 1) संरचना: अंतर्निहित भूविज्ञान, जिसमें चट्टानों का प्रकार, आयु और टेक्टोनिक गतिविधियां शामिल हैं; 2) स्थलाकृति/भूपटल (टोपोग्राफी): सतह का रूप, जिसे उत्थान (रिलीफ) और ढाल (स्लोप) द्वारा परिभाषित किया जाता है और 3) प्रक्रिया (प्रोसेस): वे कटाव और जमाव वाली शक्तियां (जैसे—जलवायु, हिमानीकरण) जिससे भू-दृश्य अस्तित्व में आता है। इसकी पूरी जानकारी उनकी 1968 की किताब लैंडफॉर्म्स ऑफ द वर्ल्ड में मिलता है।
यह प्रणाली मात्रात्मक तरीकों का इस्तेमाल करती है, जिसमें 300 मीटर से ज्यादा स्थानीय ऊंची जमीन को पहाड़ और 90-300 मीटर वाली भू-आकृतियों को पहाड़ी माना जाता है। हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने एक जरूरी बात को नजरअंदाज कर दिया है कि यह पूरी तरह से एक अकादमिक ढांचा है जिसे व्यवस्थित अध्ययन और मैपिंग के लिए बनाया गया है। इसका मकसद कभी भी खनन और रियल एस्टेट विस्तार जैसी वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए जमीन को चिन्हित करना नहीं था।
पहाड़ी और पर्वत के बीच फर्क अक्सर क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग होता है। राजस्थान, दिल्ली या हरियाणा जैसे क्षेत्रों में ये भू-आकृतियां (उनकी कुल ऊंचाई की परवाह किए बिना) परिदृश्य में पारिस्थितिकी से जुड़े जरूरी काम करती हैं। वे वाटरशेड के रूप में काम करती हैं, जलवायु को नियंत्रित करती हैं और जैव विविधता गलियारों के रूप में काम करती हैं। उनके संरक्षण को सख्त, ऊंचाई की आयातित सीमा तक सीमित करना, उनकी स्थानीय पारिस्थितिकी और भौगोलिक भूमिकाओं की अनदेखी करना है। इससे प्रणाली की पर्यावरणीय अखंडता के बजाय व्यावसायिक सुविधा को प्राथमिकता मिलती है। नतीजतन, कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां और चोटियों के बड़े हिस्से अपना पिछला कानूनी संरक्षण खो देंगे, जिससे वहां अंधाधुंध रेत खनन और रियल एस्टेट विकास के लिए नए रास्ते खुल जाएंगे।
पिछले साल 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ऊंचाई पर आधारित इस परिभाषा को स्वीकार कर लिया और नई लीज देने से पहले “टिकाऊ खनन योजना” के साथ-साथ साइंटिफिक मैपिंग का आदेश दिया। यह न्यायिक फैसला प्रभावी रूप से उन पहले की अधिसूचनाओं को पलट देता है, जिनमें अरावली को पारिस्थितिकी के तौर पर संवेदनशील क्षेत्र माना गया था और अवैध खनन व अतिक्रमण पर रोक लगाई गई थी। संरक्षणवादियों ने इस हालिया फैसले की लापरवाह निर्णय के रूप में तीखी आलोचना की है। हालांकि, भारी विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगा दी।
यह टकराव दो प्रतिस्पर्धी परिभाषाओं से उत्पन्न होता है। भारतीय वन सर्वेक्षण की भू-आकृतिक परिभाषा जिसे सुप्रीम कोर्ट की अपनी सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने भी मंजूरी दी है। इसमें 3 डिग्री से जयादा ढलान वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा माना गया है। इसमें वे कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां भी शामिल हैं, जिन्हें पर्यावरण मंत्रालय के ज्यादा सख्त 100 मीटर वाले ऊंचाई मानक के तहत बाहर कर दिया गया है। बाद वाली परिभाषा को स्वीकार करके अदालत ने वस्तुतः पारिस्थितिकी रूप से बड़े संवेदनशील क्षेत्रों को कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया था।
कभी घनी हरियाली से सजी अरावली की पहाड़ियां अब गहरी खाइयों वाली बंजर जमीन में बदल गई हैं। चट्टानों को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले जबरदस्त, लगातार धमाकों ने इस इलाके से वन्यजीवों को बाहर कर दिया है। क्रशर चलाने वाले बारूद और कंप्रेसर का इस्तेमाल करके गैर-कानूनी तरीके से पहाड़ों में सुरंगें बनाते हैं। ये बड़े विस्फोट आस-पास के गांवों की शांति में खलल डालते हैं, जहां लोग लगातार डर के साए में जीते हैं। उनके घरों और पानी की टंकियों में दरारें पड़ गई हैं, जो हर दिन गिरने के खतरे की याद दिलाती हैं।
इसके नतीजे हर जगह दिख रहे हैं
विस्फोट से होने वाला प्रदूषण, क्रशर से निकलने वाली रेत और सिलिका के बादल और क्षमता से ज्यादा लदे वाहनों से उड़ने वाली दमघोंटू धूल लोगों की सेहत पर बहुत बुरा असर डाल रही है। हालांकि खदान मालिक पर्यावरण मंत्रालय से जरूरी परमिट ले लेते हैं, लेकिन उनके संचालन लगातार उन्हीं मानकों का उल्लंघन करते हैं जिनका पालन उन्हें करना चाहिए। खुदाई का काम नियमों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि कानून और पर्यावरण दोनों की पूरी तरह से अनदेखी करके किया जाता है।
पारिस्थितिकी से जुड़ा अहम काम
कम जानकारी रखने वाले लोगों को ये पहाड़ियां शहरी इलाकों के किनारे जंगल के बेतरतीब टुकड़ों जैसी लग सकती हैं, लेकिन ये मिलकर जरूरी प्राकृतिक अवरोध बनाती हैं। इन्हें खत्म करने से भूजल रिचार्ज रुक जाएगा और वह जरूरी अवरोध टूट जाएगा जो थार रेगिस्तान की रेत को रोकता है। यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को खतरे में डालता है जो पहले से ही दुनिया में हवा की सबसे खराब गुणवत्ता से जूझ रहा है और जिसके लंबी अवधि में रेगिस्तान बनने का खतरा है।
अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई जो भी हो, लेकिन ये कई महत्वपूर्ण और आपस में जुड़े हुए पारिस्थितिकी के तौर काम करती हैं। यह प्राकृतिक अवरोध के रूप में काम करती हैं, थार से आगे बढ़ते मरुस्थलीकरण को रोककर पूर्व की ओर फैलने से रोकती हैं और गंगा के मैदानों को मध्य एशिया की पश्चिमी हवाओं की पूरी ताकत से बचाती हैं। इसकी स्थिति इसे अहम जलवायु नियंत्रक भी बनाती है; यह मानसून के बादलों की दिशा को निचले हिमालय की ओर प्रभावित करती है, जिससे उत्तर भारत में समृद्ध जैव विविधता, कृषि और आजीविका के लिए जरूरी बारिश होती है।
इसके अलावा, यह पर्वतमाला इंसानी गतिविधियों के असर को कम करने में सहायक है। यह धूल भरी आंधी की ताकत और आवृत्ति को कम करने में मदद करती है और अपने कम होते जंगलों के बावजूद, शहरी इलाकों के लिए जरूरी बफर का काम करती रहती है। इंसानों द्वारा किए गए प्रदूषण और विकास के दबाव को अवशोषित करती है।
बीता हुआ कल आज की कुंजी है,यह भूवैज्ञानिकों द्वारा माना जाने वाला शाश्वत सिद्धांत है। आज, हम ऐसे बड़े बदलाव के गवाह बन रहे हैं जो हमें पृथ्वी के इतिहास के नए और असामान्य दौर में ले आया है। हम ऐसे भूवैज्ञानिक युग में प्रवेश कर रहे हैं जिसमें इंसानी गतिविधियां धरती की सतह को आकार देने में प्राकृतिक शक्तियों को टक्कर दे रही हैं।
अरावली पर्वत-श्रृंखला का संभावित रूपांतरण इस प्रभावी बदलाव का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसका भविष्य उत्तर भारत के लिए गहरे दुष्परिणाम लेकर आएगा, खास तौर पर बढ़ते जलवायु परिवर्तन और गर्मी के परिप्रेक्ष्य में।
संदर्भ:
- घोष, एस., डिसूजा, जे., गौड, बी. आर., और प्रभाकर, एन. (2022). उत्तर-पश्चिमी भारत में अरावली क्रेटॉन के प्रीकैम्ब्रियन टेक्टोनिक विकास की एक समीक्षा: बेसमेंट कॉम्प्लेक्स और सुप्राक्रस्टल अनुक्रमों से संरचनात्मक, मेटामॉर्फिक और भू-कालानुक्रमिक परिप्रेक्ष्य। अर्थ-साइंस रिव्यूज़, 232, 104098. https://doi.org/10.1016/j.earscirev.2022.104098।
- रोजर्स, जे. जे., और संतोष, एम. (2001). कोलंबिया का विन्यास, एक मेसोप्रोटेरोज़ोइक सुपरकॉन्टिनेंट। गोंडवाना रिसर्च, 5(1), 5-22. https://doi.org/10.1016/S1342-937X(05)70883-2।
- फरीदुद्दीन और बनर्जी, डी.एम., (2020). अरावली क्रेटॉन और इसकी गतिशील बेल्ट: एक अपडेट। IUGS, खंड 43, अंक 1, पृष्ठ 88-107. https://doi.org/10.18814/epiiugs/2020/020005।
- गुप्ता, एच. (2022). अरावली पर्वत क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट और संरक्षण का भौगोलिक विश्लेषण। IOSR जर्नल ऑफ़ ह्यूमैनिटीज़ एंड सोशल साइंस, खंड 27, अंक 9, श्रृंखला 1।
लेखक (C.P. Rajendran) नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, बेंगलुरु में एडजंक्ट प्रोफेसर हैं और कंसोर्टियम फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट, कनेक्टिकट, U.S.A. के निदेशक भी हैं।
(यह खबर ‘मोंगाबे इंडिया’ से ली गई है)

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