ईरान
ईरान में अमेरिका और इजरायल की ओर से ताबड़तोड़ हमले हो रहे हैं। ईरान के तेल कुएं हों या फिर गैस फील्ड, सभी को अमेरिका और इजरायल ने टारगेट किया है। वहीं ईरान ने भी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और बहरीन समेत कई ऐसे देशों पर हमले किए हैं, जहां से बड़ी संख्या में तेल और गैस की सप्लाई दुनिया भर में की जाती है। इस जंग ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी बाधित किया है, जहां से दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल कारोबार होता है। इसके चलते भारत समेत कई देशों में तेल और गैस का संकट पैदा हो गया है। हालांकि अब भी भारत के मुकाबले कई ऐसे देश हैं, जहां इस संकट का असर ज्यादा दिख रहा है।
इसकी वजह है कि भारत ने अपनी तेल की जरूरतों को डाइवर्सिफाई किया है। वहीं पाकिस्तान, जापान, थाइलैंड और कोरिया जैसे देशों को ज्यादा परेशानी है। एक रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी देशों से अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा तेल आयात पाकिस्तान करता है। इसके बाद दूसरा नंबर जापान, तीसरा थाईलैंड और चौथा साउथ कोरिया का है। इसके बाद 5वां नंबर भारत का आता है। साफ है कि ईरान में चल रही जंग से भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा परेशान पाकिस्तान है। इस संकट के चलते एक तरफ सप्लाई पर असर पड़ा है तो वहीं कच्चे तेल के दाम भी 100 डॉलर के ऊपर लगातार बने हुए हैं।
भारत के बाद अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा तेल आयात करने वाले देशों में मालदीव, ताइवान, चीन, श्रीलंका, मलयेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस हैं। पाकिस्तान ने तो अपने स्कूलों, दफ्तरों आदि को लेकर भी पाबंदियां लगाई हैं और लोगों को घरों में ही रहने के लिए प्रोत्साहित किया है। स्पष्ट है कि यह संकट उसे ज्यादा परेशान कर रहा है। अब भारत की बात करें तो वह अपनी जरूरत का करीब 40 फीसदी तेल मिडल ईस्ट के देशों से आयात करता है। इसके अलावा भारत अपनी जरूरत की 80 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है। देश में एलपीजी सिलेंडरों की कमी है और उनका संकट पहले ही परेशानी पैदा कर रहा है।
हालांकि तेल के मामले में एक राहत की बात यह है कि भारत अपनी जरूरत का 40 फीसदी तेल ही खाड़ी देशों से खरीदता है। इसे भी घटाया जा सकता है क्योंकि रूस, अमेरिका और नॉर्वे जैसे देशों के तौर पर उसके पास एक विकल्प है। हालांकि गैस का संकट बड़ा है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल खाड़ी देशों से ही लेता है। दुनिया में फिलहाल जेट फ्यूल की भी कमी है और इसके चलते हजारों उड़ानों पर भी सीधे तौर पर असर पड़ा है। रोचक बात यह है कि इस संकट से यूरोप लगभग अछूता ही है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपनी जरूरत की ज्यादातर गैस रूस से खरीदता है। फिर उसने अमेरिका और नॉर्वे को भी विकल्प के तौर पर चुना है। रूस और यूक्रेन के बीच जंग के बाद यूरोप ने कुछ खरीद रूस से घटाई थी, लेकिन अब भी वह बड़ा खरीददार है।

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