उड़ान डेस्क। भारत और अमेरिका के बीच महीनों चली बातचीत के बाद आखिरकार ट्रेड डील पर सहमति बन गई है, और इसका सीधा असर आज शेयर बाजार में देखने को मिल सकता है। सोमवार देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अहम समझौते का ऐलान किया। इस डील के बाद ऑटोमोबाइल कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों जैसे भारत फोर्ज, संवर्धन मदरसन, सोना बीएलडब्ल्यू और अन्य शेयरों में तेज खरीदारी की संभावना जताई जा रही है। बाजार की नजर अब इस बात पर है कि यह समझौता एक्सपोर्ट-ड्रिवन कंपनियों के लिए कितनी बड़ी राहत लेकर आता है।
50% से 18% पर आया टैरिफ, एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत
इस समझौते के तहत अब अमेरिका में भेजे जाने वाले भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगेगा, जो पहले 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। यह बढ़ा हुआ टैरिफ उस वक्त लगाया गया था जब डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा किया था कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। अब टैरिफ में आई इस बड़ी कटौती से भारतीय निर्यातकों की लागत घटेगी और उनकी कीमत प्रतिस्पर्धा बेहतर होगी। बदले में भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर अपने टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर को शून्य करने की दिशा में आगे बढ़ने का भरोसा दिया है।
Auto Ancillary कंपनियों के लिए क्यों अहम है यह डील
ऑटो कंपोनेंट सेक्टर के लिए यह समझौता बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इन कंपनियों की अमेरिका में मजबूत मौजूदगी है। टैरिफ कम होने से न सिर्फ मार्जिन सुधरेंगे, बल्कि ऑर्डर विजिबिलिटी भी बेहतर होगी। साथ ही अमेरिकी OEMs के साथ लंबे समय के सप्लायर रिलेशनशिप और मजबूत हो सकते हैं, जिससे आने वाले वर्षों में एक्सपोर्ट-आधारित कमाई को बड़ा सहारा मिल सकता है।
किन कंपनियों की US पर निर्भरता सबसे ज्यादा
JM फाइनेंशियल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत फोर्ज की कुल बिक्री में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत है। संवर्धन मदरसन इंटरनेशनल लिमिटेड की 19 प्रतिशत और हैप्पी फोर्जिंग्स की करीब 5 प्रतिशत आय अमेरिकी बाजार से आती है। वहीं सोना बीएलडब्ल्यू और यूनिपार्ट्स इंडिया की अमेरिका पर निर्भरता काफी ज्यादा है, जहां उनकी हिस्सेदारी क्रमशः 41 प्रतिशत और 55 प्रतिशत तक पहुंचती है। ऐसे में टैरिफ में कटौती इन कंपनियों के लिए सीधे फायदे का सौदा मानी जा रही है।
भारतीय बाजार पर भी हटेगा बड़ा दबाव
भारतीय शेयर बाजार के लिहाज से यह ट्रेड डील एक बड़े ओवर हैंग को हटाने जैसा है। बीते कुछ महीनों से विदेशी निवेशक सतर्क बने हुए थे और बाजार लगातार दबाव में था। जनवरी के दौरान निफ्टी अपने सबसे निचले स्तर पर 1,000 अंकों से ज्यादा टूट चुका था, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अरबों डॉलर के शेयर बेच दिए थे। ट्रेड को लेकर अनिश्चितता, रुपए में कमजोरी और ग्लोबल रिस्क-ऑफ माहौल ने भारतीय बाजार को दूसरे उभरते बाजारों से पीछे धकेल दिया था।

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