February 26, 2026

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Lifestyle: टीनएजर पर मंडरा रहा गंभीर खतरा, AIIMS की रिसर्च ने दी चेतावनी

कंधे, कमर, गर्दन से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे टीनएजर

उड़ान डेस्क। यदि आपके बच्चे भी घंटों मोबाइल और कंप्यूटर में बिजी रहते हैं तो यह जानकारी आपके बहुत काम की है। दरअसल, हाल ही में AIIMS और ICMR के अध्ययन ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं कि यह आदत किशोरों की सेहत को धीरे-धीरे कितना नुकसान पहुंचा रही है। मांसपेशियों की कमजोरी से लेकर लचीलापन खत्म होने तक, असर बेहद गंभीर हो सकते हैं। जानिए डॉक्टरों की राय और आसान उपाय

आधुनिक जीवनशैली में मोबाइल जीवन की अनिवार्यता में शामिल हो गया है। इसी तरह कंप्यूटर भी युवाओं की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है। देखा जाए तो आजकल के बच्चों और किशोरों की दुनिया लगभग मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर तक सिमट गई है। सुबह उठते ही मोबाइल उनके हाथ में, स्कूल से लौटते ही फिर स्क्रीन पर ध्यान। माता-पिता भी अक्सर अपने काम और घर की जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं, और बच्चे अपने कमरे में बैठकर घंटों खेल (गेम) खेलते या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं। कई बार हमें लगता है कि बस थोड़ी देर की यह आदतें हैं। इनसे कुछ नुकसान नहीं होता है।

मगर दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( AIIMS, Delhi) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के सहयोग से हुए हालिया अध्ययन में चौंकाने वाला सच सामने आया है। अध्ययन में सामने आया है कि बच्चों की झुककर बैठने और स्क्रीन से चिपके रहने की आदत उनकी सेहत के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। वहीं, हेल्थ एक्सपर्ट्स भी इस अध्ययन का समर्थन कर रहे हैं।

कैसे किया गया यह अध्ययन

AIIMS और ICMR के इस अध्ययन में कक्षा 9 से 12 के 380 छात्रों का विश्लेषण किया गया, जिनकी उम्र 15-18 वर्ष थी। अध्ययन के अनुसार, बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम, कम फिजिकल एक्टिविटी और प्राकृतिक तरीके से बैठने की आदत का अभाव उन्हें बीमार बना रहा है। यह सब उनके शरीर में दर्द, मांसपेशियों की जकड़न और लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) की कमी जैसी समस्याएं पैदा कर रहा है।

किशोरों की नई आदतें और उनके असर

AIIMS के अध्ययन में सामने आया है कि किशोरों में गर्दन और कंधे में दर्द, कमर में समस्या और पैरों की मांसपेशियों में कसावट आम हो गई है। बच्चों के मोबाइल और कंप्यूटर पर लंबे समय तक झुकी हुई स्थिति में बैठने से मांसपेशियों में कसावट जैसी समस्याएं बढ़ रही है।
चिकित्सा से जुडे एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चों के शरीर में छोटी उम्र में ही इस तरह की समस्याएं शुरू हो जाती है, जिससे उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित होती हैं।

ज्यादा स्क्रीन टाइम और फिजिकल एक्टिविटी की कमी

अध्ययन में सामने आया कि बच्चों का अधिकांश समय स्क्रीन पर बीतता है, फिर चाहे वह मोबाइल हो, टीवी, कंप्यूटर या लैपटॉप। वह इन उपकरणों से चिपके रहते हैं। दिनभर सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं या गेम्स खेलते हैं। इसकी वजह से वे घर से बाहर खेले जाने वाले खेलों (Outdoor Games) में में कम भाग ले रहे हैं।

बहुत देर एक जगह ना बैठें  

बता दें सिर्फ बैठे रहना शरीर की मांसपेशियों को कमजोर करता है। इसकी वजह से शरीर की मुद्रा (पोश्चर) बिगड़ती है। भारतीय बच्चों में अब पारंपरिक तरीके से बैठना यानी जमीन पर क्रॉस-लेग या स्क्वाट पॉजीशन में बैठना भी कम हो गया है, जिससे उनके शरीर का प्राकृतिक लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) धीरे-धीरे खत्म हो रही है। चिकित्सकों की मानें तो बच्चों को कम उम्र से ही सही बैठने की आदत और शारीरिक गतिविधियों में भागीदारी सिखाना जरूरी है, ताकि उनके मांसपेशियां मजबूत और लचीली रहें। वरना उनको पोश्चर से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

समस्याओं के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?

AIIMS और ICMR के अध्ययन में मुख्य कारणों के रूप में जो तथ्य सामने आए हैं, वो हैरान कर देने वाले हैं जैसे,

  • अत्यधिक स्क्रीन टाइम: मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर पर लंबा समय बिताना।
  • कम शारीरिक गतिविधि: खेल-कूद और बाहर खेलने में कमी।
  • पारंपरिक आदतों का अभाव: जमीन पर बैठना और जमीन पर नंगे पैर नहीं घूमना।
  • वार्म-अप की कमी: खेलों से पहले शरीर को तैयार करना या स्ट्रेचिंग (खींचाई) न करना।
  • लचीलेपन में कमी: स्क्वाटिंग, पैर क्रॉस करके बैठने जैसी आदतें गायब।

हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चों में इन आदतों की कमी उनके शरीर में दर्द, जकड़न और शरीर की सामान्य गतिविधियों में रुकावट पैदा कर रही है। इससे शरीर के जोड़ पूरी तरह खुल नहीं पाते जिससे अंगों को पूरी ऑक्सिजन भी नहीं मिलती है। जाहिर है कि लंबे समय में यह अलग अलग तरीके से परेशान करता है।

कैसे सुधरेगी स्थिति

बच्चों की स्थिति में सुधार के लिए अध्ययन में 12 हफ्तों का फिजियोथेरेपी (शारीरिक चिकित्सा) प्रोग्राम लागू किया गया। इसके परिणामस्वरूप बच्चों के शरीर में लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) बढ़ा, शरीर की सामान्य गतिविधियों में भी सुधार हुआ और मांसपेशियों की ताकत बढ़ी।

बच्चों और किशोरों को बीमार होने से बचाने के आसान उपाय

  • गेम्स या स्पोर्ट्स से पहले वॉर्मअप और स्ट्रेचिंग जरूर करें।
  • रोजाना कुछ समय बाहर नंगे पैर एक्टिविटी करते हुए बिताएं।
  • स्क्वाट पॉजीशन, पैर क्रॉस करके बैठना जैसी नैचुरल स्ट्रेचिंग अपनाएं।
  • दिनभर एक्टिव रहें, सिर्फ मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर समय न बिताएं।
  • शारीरिक गतिविधियों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही।

बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए माता-पिता क्या करें

  • बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करें।
  • बच्चों को आउटडोर खेलों (घर से बाहर) और शारीरिक गतिविधि में शामिल करें।
  • घर पर परिवार के साथ टहलना, स्ट्रेचिंग या खेलों में समय बिताएं।
  • बैठने की आदतों पर ध्यान दें और नियमित याद दिलाएं।
  • बच्चों को प्राकृतिक सेल्फ-स्ट्रेचिंग (Natural Self-Stretching) और वार्मअप (Warm-Up) का महत्व समझाएं।

एक्सपर्ट्स की राय में क्या है स्वस्थ भविष्य की सही दिशा

डॉक्टर्स का कहना है, ‘AIIMS और ICMR के अध्ययन से यह साफ हो गया है कि किशोरों की बदलती जीवनशैली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे रही है। यह सिर्फ दर्द या जकड़न तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में शरीर के पॉस्चर और मांसपेशियों और हड्डियों के स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है।

डिजिटल दुनिया में रहने के बावजूद बच्चों को शारीरिक रूप से एक्टिव रहने, सही बैठने की आदतें और नैचुरल स्ट्रेचिंग की जरूरत है। माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

छोटे-छोटे बदलाव जैसे आउटडोर गेम्स, रोज स्ट्रेचिंग, वॉर्मअप, और स्क्रीन टाइम कंट्रोल से बच्चों को मजबूत और स्वस्थ बना सकते हैं। स्वास्थ्य केवल डॉक्टर की दवा से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों से भी बनता है।’

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