उत्तर प्रदेश से दिव्यांशु की रिपोर्ट…
ews decision by supreme court : सामाजिक न्याय और जनहित के मुद्दों पर मुखर आवाज उठाने वाले संगठनों ने इस बार यूजीसी के नए नियमों पर स्टे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जनों संगठनों ने एक साझा बयान जारी करते हुउ यूजीसी इक्विटी नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे लगाने को घोर निराशाजनक बताया है। संगठनों की ओर से कहा गया है कि, स्टे लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी हास्यास्पद है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे लगाना और साथ में की गई टिपण्णी यूजीसी इक्विटी नियमावली के विरोधियों के पक्ष में जाती हुई दिख रही है।
साक्षा बयान में कहा गया है कि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और टिप्पणियां अक्सर सदियों से अन्याय, उत्पीडऩ व भेदभाव झेल रहे एससी-एसटी व ओबीसी के लिए निराशाजनक होती हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर कर दिया था, जिसे 2 अप्रैल 2018 के ऐतिहासिक आंदोलन और शहादतों के बाद फिर से हासिल किया जा सका। दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान विरोधी ईडब्ल्यूएस (EWS) पर एक दिन के लिए भी स्टे नहीं लगाया और सही घोषित कर दिया।
क्या है ईडब्ल्यूएस श्रेणी
वर्ष 2019 में 103वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से शुरू की गई, ईडब्ल्यूएस श्रेणी सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण प्रदान करती है । इस नीति का उद्देश्य उन आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए समान अवसर प्रदान करना है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी अन्य आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते हैं।
सामाजिक अन्याय बढ़ रहा
जारी बयान में संगठनों की ओर से कहा गया है कि मौजूदा दौर में संविधान पर बढ़ते हमले के साथ एससी-एसटी व ओबीसी के साथ सामाजिक अन्याय बढ़ रहा है। इस दौर में हिंसा-उत्पीडऩ व भेदभाव ऊंचाई हासिल कर रहा है। एक तरफ, 45 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में एससी के 64 प्रतिशत, एसटी के 84 प्रतिशत और ओबीसी के 80 प्रतिशत प्रोफेसर के आरक्षित पद खाली हैं तो 45 विश्वविद्यालयों में 38 कुलपति अगड़ी जाति से हैं। यूजीसी के अपने आंकड़े ही बताते हैं कि 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। संगठनों की ओर से कहा गया है कि संविधान के खिलाफ जाकर सरकार ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू कर दिया तो वहीं, एससी-एसटी व ओबीसी के आरक्षण पर लगतार हमला जारी है। यह भारतीय संविधान की हत्या करने जैसा प्रयास है।
जाति जनगणना की मंशा पर भी सवाल
संगठनों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सामाजिक न्याय के लिए संपूर्णता में ठोस व कारगर नीतियां व योजनाएं बनाने के लिए जरूरी और बुनियादी एजेंडा जाति जनगणना है, जो लंबे समय से अनुत्तरित है। लगातार इसके पक्ष में आवाज उठती रही है, पिछले दिनों सरकार ने जाति जनगणना कराने की घोषणा की, लेकिन अभी जो जनगणना का फॉर्म जारी हुआ है, उसमें एससी और एसटी के लिए कॉलम तो है, लेकिन ओबीसी और शेष जातियों का उल्लेख नहीं है। ऐसे में सरकार की जाति आधारित जनगणना कराने की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
हम लड़ेंगे, पीछे नहीं हट सकते
संगठनों की ओर से दो टूक कहा गया है कि यूजीसी द्वारा लाई गयी इक्विटी नियमावली रोहित वेमुला और डाक्टर पायल ताडवी की संस्थानिक हत्या के बाद जारी संघर्षों की उपलब्धि है। अपने हक के लिए हम पीछे कतई नहीं हट सकते, ठोस व कारगर इक्विटी नियमावली के लिए जी जान से लड़ेंगे। संगठनों का मानना है कि बहुजनों को सम्मान, हर क्षेत्र में हर स्तर पर उचित हिस्सेदारी और बराबरी की लड़ाई को निर्णायक बनाना ही होगा, एकजुट होना ही होगा। यह संविधान बचाने और बाबा साहब के सपनों के भारत के निर्माण की जरूरी लड़ाई है।
इन संगठनों ने उठाई आवाज
साझा प्रेस बयान जारी करने वाले संगठनों में सामाजिक न्याय आंदोलन(बिहार) यादव सेना, रिहाई मंच, सामाजिक न्याय आंदोलन (यूपी), सामाजिक न्याय मंच(यूपी), हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी, पूर्वांचल किसान यूनियन,पिछड़ा वर्ग उत्थान संघ, संविधान बचाओ संघर्ष समिति, राष्ट्रीय किसान सेवा समिति, कम्यूनिस्ट फ्रंट(बनारस), नेशनल एलायंस फॉर सोशल जस्टिस, पूर्वांचल बहुजन मोर्चा, राष्ट्रीय बांस शिल्पी महासंघ, युवा चेतना मंच, राष्ट्रीय युवा मोर्चा, बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन(बिहार), राष्ट्रीय विद्यार्थी चेतना परिषद, नागरिक अधिकार मंच, अल्पसंख्यक दलित एकता मच, BPSS, अखंड भारत मिशन, अखिल भारतीय प्रजापति कुंभकार महासभा फोरम, निषाद सेवा संस्थान (उत्तर प्रदेश) शामिल हैं।

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