March 25, 2026

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“गरीबी 41% से घटकर 4% हुई! नीतीश कुमार ने किया कमाल, बिहार ने बंगाल को भी पीछे छोड़ा”

पटना.
बिहार में इन दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा हर चौक-चौराहे पर हो रही है.  नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार का सीएम कौन होगा, इस सवाल का जवाब भी लोग जानना चाह रहे हैं. वहीं नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की जेडीयू में जॉइनिंग के साथ ही उनके सियासी उदय की भी चर्चा जोरों पर है. लेकिन, इन सबके बीच नए बिहार को लेकर जो आंकड़े सामने आए  हैं, वह सच में नीतीश कुमार के विजन और विजडम दोनों की बेहतरीन मिसाल पेश करते हैं।

दरअसल कभी विकास के मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिने जाने वाले बिहार को लंबे समय तक “बीमारू राज्य” कहा जाता रहा. लेकिन, अब तस्वीर तेजी से बदलती दिख रही है. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य श्यामका रवि ने ‘प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद’ (Economic Advisory Council to the Prime Minister) से जुड़ी अपनी भूमिका के साथ इंडिया एक्स्प्रेस (The Indian Express) में लिखे लेख में बताया है कि पिछले एक दशक में बिहार ने जीवन स्तर, गरीबी और पोषण क्षमता जैसे कई अहम सूचकों पर उल्लेखनीय सुधार किया है।

संजय झा ने भी शेयर किया पोस्ट
इस आर्टिकल में बताया गया कि गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान बिहार में राजनीतिक स्थिरता और शासन की निरंतरता का असर विकास के आंकड़ों में साफ दिखाई देता है. कई मामलों में बिहार ने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल को भी पीछे छोड़ दिया है. उपभोग, गरीबी में कमी और पोषण क्षमता जैसे क्षेत्रों में बिहार की प्रगति राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचती दिख रही है. राज्यसभा सांसद और जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने भी इस आर्टिकल को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट शेयर इसे आंख खोलने वाली रिपोर्ट बताई है।

हैरान करने वाले हैं रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े और तथ्य

    2011 से 2024 के बीच बिहार के ग्रामीण इलाकों में रियल मासिक प्रति व्यक्ति खर्च (MPCE) में औसतन 4.5% वार्षिक वृद्धि हुई, जो राष्ट्रीय औसत 3.1% से करीब 50% अधिक है।

    शहरी बिहार में रियल MPCE की वृद्धि 4.6% रही, जबकि पूरे भारत में यह 2.6% रही.

    ग्रामीण बिहार में मासिक प्रति व्यक्ति खर्च 2011-12 में ₹1,086 से बढ़कर ₹3,531 हो गया.

    इसी अवधि में पश्चिम बंगाल में यह ₹1,211 से बढ़कर ₹3,366 तक पहुंचा, लेकिन उसकी वृद्धि दर कम रही.

    शहरी बिहार में नॉमिनल MPCE की वृद्धि 10.7% रही, जबकि पश्चिम बंगाल में यह केवल 6.9% दर्ज की गई.

राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बिहार की स्थिति में सुधार

    बिहार का ग्रामीण MPCE राष्ट्रीय औसत के 80.5% से बढ़कर 91.7% तक पहुंच गया.
    शहरी क्षेत्रों में यह 58.7% से बढ़कर 75.4% हो गया.
    इसके विपरीत पश्चिम बंगाल के आंकड़ों में गिरावट देखी गई.
    ग्रामीण अनुपात 89.8% से घटकर 87.5% हो गया.
    शहरी अनुपात 97.5% से घटकर 82.8% रह गया.

गरीबों की आय में भी तेज वृद्धि

    ग्रामीण बिहार में सबसे गरीब 20% आबादी की आय में 4.2% CAGR की वृद्धि हुई.
    मध्यम वर्ग में यह 4.6% और अमीर वर्ग में 4.4% रही.
    शहरी बिहार में गरीब वर्ग की वृद्धि 5.7% रही, जो सबसे ज्यादा है.

गरीबी में भारी गिरावट

    2011-12 में बिहार में गरीबी दर 41.3% थी.
    2023-24 में यह घटकर 4.4% रह गई, जो राष्ट्रीय औसत 4.0% के लगभग बराबर है.
    पश्चिम बंगाल की गरीबी दर इसी अवधि में 30.4% से घटकर 6% रही, जो बिहार से अधिक है।

पोषण क्षमता में भी सुधार

    2011-12 में बिहार में 64.7% परिवार पोषणयुक्त भोजन खरीदने में सक्षम नहीं थे.
    2023-24 में यह घटकर 27.4% रह गया.
    पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 56% से घटकर 34.6% तक आया

क्या कहता है विश्लेषण?
रिपोर्ट के अनुसार बिहार में जीवन स्तर में सुधार, गरीबी में तेज कमी और खपत क्षमता में बढ़ोतरी जैसे संकेत स्पष्ट हैं. विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक स्थिर शासन और नीतिगत निरंतरता ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जिस बिहार को कभी स्थायी आर्थिक पिछड़ेपन का उदाहरण माना जाता था, अब वही राज्य कई सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है।

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