उड़ान न्यूज, नईदिल्ली। दिल्ली की सडक़ों पर सियासी संग्राम और राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। आज शुक्रवार को दिनभर भारी सियासी गहमागहमी रही, इस बीच कांग्रेस के मनरेगा बचाओ संग्राम के दौरान दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव सहित अन्य प्रदर्शनकारी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया, पुलिस के इस रवैये से लोकतंत्र की आवाज को दबाने के सवाल भी उठ खड़े हुए हैं।
आधिकारिक प्रतिक्रिया और राजनीतिक माहौल
कांग्रेस नेतृत्व ने इस पुलिसिया कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करना उनका संवैधानिक अधिकार है, जिसे सरकार दबाने की कोशिश कर रही है। वहीं, पुलिस सूत्रों का कहना है कि बिना अनुमति के भीड़ जमा होने और निषेधाज्ञा के उल्लंघन के कारण यह कार्रवाई आवश्यक थी।
विवादों के भंवर में ‘मनरेगा’
दरअसल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस ‘ग्राम स्वराज’ की कल्पना की थी, आज उसकी सबसे मजबूत कड़ी मानी जाने वाली ‘मनरेगा’ (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) विवादों के भंवर में है। देश के विभिन्न हिस्सों से ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की गूँज सुनाई दे रही है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मुद्दा अब केवल एक सरकारी योजना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों मजदूरों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। आंदोलनकारियों का दावा है कि वर्तमान सरकार नीतिगत बदलावों के नाम पर गरीबों के संवैधानिक हक को कुचलने की साजिश कर रही है।
मुख्य घटनाक्रम: आक्रोश की गूँज पिछले कुछ हफ्तों में देश के ग्रामीण अंचलों से लेकर राजधानी के जंतर-मंतर तक मजदूरों और नागरिक संगठनों का जमावड़ा देखा गया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि डिजिटल उपस्थिति (NMMS), आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) और बजट में निरंतर कटौती ने इस योजना को पंगु बना दिया है।
संग्राम के मुख्य बिंदु
बजट में कटौती: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे मनरेगा के बजट को कम कर रही है, जिससे मांग के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है।
तकनीकी बाधाएँ: ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट के बावजूद डिजिटल हाजिरी को अनिवार्य करना मजदूरों के लिए जी का जंजाल बन गया है। हाजिरी न लग पाने के कारण उनकी दिहाड़ी मारी जा रही है।
ग्राम स्वराज बनाम दिल्ली की नीतियां: आंदोलनकारियों का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे ये बदलाव गांधीजी के ग्राम स्वराज के उस सपने के विपरीत हैं, जिसमें सत्ता और संसाधनों का केंद्र गांव को माना गया था।
आधिकारिक पक्ष और कानूनी पेच
जहां एक तरफ जनता सड़कों पर है, वहीं सरकारी सूत्रों का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किए गए हैं। सरकार के अनुसार, आधार लिंकेज से ‘फर्जी मजदूरों’ के नाम हटाए जा रहे हैं और पैसा सीधे असली लाभार्थी के खाते में पहुँच रहा है।
हालांकि, अधिनियम (MGNREGA Act, 2005) के तहत, काम मांगना एक कानूनी अधिकार है और काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तकनीकी कारणों से किसी मजदूर को काम या भुगतान से वंचित किया जाता है, तो यह कानून का उल्लंघन है। इसी बिंदु को लेकर ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के बैनर तले कानूनी लड़ाई की भी तैयारी की जा रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
मनरेगा न केवल रोजगार का साधन है, बल्कि यह ग्रामीण संकट के समय एक सुरक्षा कवच का काम करती है। सूखे या फसल बर्बादी के वक्त यही योजना लाखों परिवारों को भुखमरी से बचाती है। यदि इस योजना की पहुँच सीमित होती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण क्रय शक्ति पर पड़ेगा, जो अंततः देश की जीडीपी को प्रभावित कर सकता है।
‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ सरकारी सुधारों की दलीलें हैं और दूसरी तरफ करोड़ों हाथों का अधिकार। महात्मा गांधी के आदर्शों की कसौटी पर यह संघर्ष केवल रोजगार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आंदोलनों के दबाव में नीतियों पर पुनर्विचार करती है या फिर ग्राम स्वराज की यह महत्वपूर्ण कड़ी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।

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