कानपुर
आईआईटी के बायोलाजिकल साइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर बुशरा अतीक और उनकी शोध टीम को कैंसर अनुसंधान में बड़ी कामयाबी मिली है। प्रो. अतीक ने कोलोरेक्टल कैंसर (आंत का कैंसर) को शरीर में तेजी से फैलाने वाले और इसके इलाज को बेअसर करने वाले एक खास प्रोटीन डीकेसी -1 की पहचान की है।
चिकित्सा जगत में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही यह खोज प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'नेचर कम्युनिकेशंस' ने 18 मई को ही प्रकाशित की है। इस खोज से भविष्य में आंत के कैंसर का अधिक सटीक और प्रभावी इलाज संभव हो सकेगा।
प्रो. बुशरा अतीक के शोध के मुताबिक शरीर में डीकेसी-1 प्रोटीन का स्तर बढ़ने से कैंसर कोशिकाएं न सिर्फ बेहद आक्रामक हो जाती हैं, बल्कि उन पर दवाओं का असर भी खत्म होने लगता है। शोध के अनुसार यह प्रोटीन शरीर में स्फिंगोलिपिड नामक फैट के निर्माण की प्रक्रिया को बाधित करता है।
स्फिंगोलिपिड आमतौर पर कोशिकाओं की बनावट और उनकी प्राकृतिक मृत्यु (अपोप्टोसिस) को नियंत्रित करते हैं। जब डीकेसी-1 का स्तर बढ़ता है तो शरीर में ऐसे लिपिड ज्यादा बनने लगते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को सुरक्षा कवच देते हैं। यही वजह है कि कई गंभीर मरीजों में कीमोथेरेपी और अन्य दवाएं बेअसर हो जाती हैं।
शोध अध्ययन में सामने आया है कि जिन मरीजों में इस प्रोटीन का स्तर ज्यादा था, उनमें कैंसर बेहद उन्नत (एडवांस्ड) स्टेज में पहुंच चुका था। इस आधार पर जब शोधकर्ताओं ने लैब के भीतर आरएनए इंटरफेरेंस तकनीक के जरिए जब डीकेसी-1 प्रोटीन के स्तर को कम किया तो इसके चौंकाने वाले और सकारात्मक परिणाम देखने को मिले।
ऐसा करने से कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने की रफ्तार काफी धीमी हो गई। कैंसर कोशिकाएं दवाओं और कीमोथेरेपी के प्रति अधिक संवेदनशील हो गईं, यानी उन पर दवाओं ने दोबारा काम करना शुरू कर दिया।
प्रो. बुशरा अतीक के अनुसार कैंसर सिर्फ जीन या कोशिकाओं की खराबी नहीं है, बल्कि यह शरीर के मेटाबालिज्म (उपापचय) से भी गहराई से जुड़ा है। अब शोधकर्ता डीकेसी-1 और स्फिंगोलिपिड मेटाबालिज्म को टारगेट करने वाली नई दवाएं विकसित कर सकेंगे, जो कैंसर के मरीजों के लिए एक नई जीवनदायिनी साबित हो सकती हैं।

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