May 19, 2026

Udaan Publicity

The Voice of Democracy

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नानी को भी मिला बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार

चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई नाबालिग बच्चा अपनी नानी की देखरेख में रह रहा है, तो नानी उसके भरण-पोषण के लिए अदालत में दावा कर सकती है, भले ही बच्चे की मां जीवित हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तकनीकी आपत्तियों के आधार पर बच्चे के अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता।

जस्टिस नीरजा के कल्सन ने अपने फैसले में कहा कि कानून केवल विवादों का निपटारा करने के लिए नहीं है, बल्कि उन लोगों की सुरक्षा के लिए भी है जो स्वयं अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। अदालत ने माना कि वैवाहिक रिश्तों के टूटने के बाद अक्सर नानी ही बच्चे की परवरिश, शिक्षा, दवाइयों और भावनात्मक सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती है। मामला अंबाला की उस याचिका से जुड़ा था जिसमें पिता ने यह दलील दी थी कि बच्चे की मां जीवित है और वही उसकी प्राकृतिक अभिभावक है, इसलिए केवल मां ही बच्चे की ओर से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। पिता ने यह भी कहा कि तलाक के समय एकमुश्त समझौता राशि दी जा चुकी है, जिससे उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। हालांकि अदालत ने इन दोनों तर्कों को खारिज कर दिया। जस्टिस कल्सन ने कहा कि अदालत के सामने नानी या मां का अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का अधिकार सर्वोपरि है। बच्चे का भरण-पोषण उसका वैधानिक अधिकार है और उसे केवल तकनीकी आधार पर रोका नहीं जा सकता।

अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 को सामाजिक न्याय का प्रावधान बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य जरूरतमंदों को उपेक्षा और अभाव से बचाता है। अदालत ने कहा कि “मेंटेनेंस” केवल जीवित रहने भर का साधन नहीं है, बल्कि इसमें भोजन, कपड़े, आवास, शिक्षा, चिकित्सा और सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं शामिल हैं।फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हुए निजी समझौते बच्चे के स्वतंत्र अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकते। बच्चे की जरूरतें समय के साथ बदलती रहती हैं। शिक्षा का खर्च बढ़ता है, चिकित्सा आवश्यकताएं उत्पन्न होती हैं और महंगाई जीवन-यापन को प्रभावित करती है। ऐसे में तलाक के समय दी गई एकमुश्त राशि को भविष्य की सभी जिम्मेदारियों से मुक्ति नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि समाज की वास्तविकता यही है कि पारिवारिक अस्थिरता के दौरान कई बार नानी ही बच्चे के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का आधार बनती है। वह केवल अस्थायी आश्रय नहीं देती, बल्कि बच्चे के भविष्य को संभालने का दायित्व भी निभाती है। यही कारण है कि ऐसे मामलों में नानी को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

Spread the love