भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद पर अपना रुख दोहराते हुए 15 मई, 2026 को हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (Court of Arbitration) द्वारा जारी फैसले को अमान्य करार दिया है। यह फैसला पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं में जल भंडारण की अनुमति से जुड़ा था। भारत का कहना है कि यह न्यायाधिकरण संधि के प्रावधानों के अनुरूप गठित नहीं किया गया और इसलिए उसका निर्णय भारत पर बाध्यकारी नहीं है।
पहलगाम हमले के बाद बदला भारत का रुख
भारत ने 23 अप्रैल, 2025 को सिंधु जल संधि के सहयोगात्मक प्रावधानों को स्थगित करने की घोषणा की थी। यह फैसला जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद लिया गया था, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सीमित सैन्य संघर्ष भी हुआ। भारत का कहना है कि संधि से जुड़े सहयोगात्मक प्रावधान तब तक निलंबित रहेंगे, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से समर्थन देना बंद नहीं करता। विदेश मंत्रालय ने 3 जुलाई, 2026 को भी इस नीति की पुष्टि की थी।
‘संधि की नींव सद्भावना थी’
भारत का तर्क है कि 1960 की सिंधु जल संधि आपसी सद्भावना और सहयोग की भावना पर आधारित थी। नई दिल्ली का कहना है कि यदि एक पक्ष लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो दूसरे पक्ष से संधि के सहयोगात्मक दायित्वों का निर्वहन करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसने अभी तक पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के प्राकृतिक प्रवाह में कोई रुकावट नहीं डाली है। भारत के अनुसार, फिलहाल केवल सहयोगात्मक प्रक्रियाएं, जैसे हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना, स्थायी सिंधु आयोग की बैठकें और विवाद समाधान तंत्र में भागीदारी, स्थगित की गई हैं।
विवाद समाधान प्रक्रिया पर आपत्ति
भारत की आपत्ति मुख्य रूप से विवाद समाधान प्रक्रिया को लेकर है। उसका कहना है कि सिंधु जल संधि का अनुच्छेद IX विवादों के समाधान के लिए चरणबद्ध प्रक्रिया निर्धारित करता है। पहले मामला स्थायी सिंधु आयोग के समक्ष जाना चाहिए, उसके बाद तकनीकी विवादों के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट और अंत में केवल कानूनी व्याख्या से जुड़े मामलों में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का विकल्प अपनाया जा सकता है। भारत का आरोप है कि किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से जुड़े मामलों में पाकिस्तान ने इस निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का रुख किया, जबकि भारत पहले ही न्यूट्रल एक्सपर्ट की नियुक्ति का अनुरोध कर चुका था। नई दिल्ली का कहना है कि एक ही विवाद पर समानांतर रूप से दो अलग-अलग मंचों पर सुनवाई संधि की मूल भावना के विपरीत है और इससे विरोधाभासी फैसलों की स्थिति पैदा हो सकती है।
छह दशक तक निभाई संधि
भारत का दावा है कि उसने 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि का पालन 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के दौरान भी किया। इसके अलावा संसद हमले (2001) और मुंबई आतंकी हमले (2008) जैसी घटनाओं के बावजूद भारत ने पाकिस्तान की ओर जल प्रवाह नहीं रोका। भारत का यह भी कहना है कि वर्षों से उसकी कई जलविद्युत परियोजनाएं, जैसे सलाल, तुलबुल, किशनगंगा, बगलिहार और रतले, विवादों और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण प्रभावित हुईं, जिससे लागत और निर्माण अवधि दोनों बढ़ीं।
भारत का दावा- पानी का प्रवाह जारी
भारत का कहना है कि उसने अब तक पश्चिमी नदियों के पानी को न तो रोका है और न ही उसका रुख बदला है। सरकार के अनुसार, यह कदम केवल सहयोगात्मक तंत्र को स्थगित करने तक सीमित है और परिस्थितियां सामान्य होने पर भविष्य में इसकी समीक्षा की जा सकती है। वहीं, पाकिस्तान ने भारत के फैसले का विरोध किया है और जल समझौते में किसी भी एकतरफा बदलाव पर गंभीर आपत्ति जताई है। दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक तनाव लगातार बना हुआ है।

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