September 3, 2026

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स्वरोजगार में अनुभव पर कमाई 3.8 फीसदी बढ़ी, नौकरी में 6.5 फीसदी बढ़ोतरी

World Bank Report : वेतन वाली नौकरी की तुलना में खुद का काम करने पर कमाई में वृद्धि धीमी होती है और काम के जरिये कौशल बढ़ाने के मौके भी कम मिलते हैं। यह जानकारी वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ‘बिल्डिंग ह्यूमन कैपिटल वेयर इट मैटर्स : होम्स, नेवरहुड्स, ऐंड वर्कप्लेसेस’ के अनुसार भारत में पांच साल के काम के अनुभव से मिलने वाला सालाना रिटर्न खुद का काम करने वाले वर्करों के लिए 3.8 प्रतिशत था जबकि वेतन पर काम करने वालों के लिए यह 6.5 प्रतिशत था।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कम और मध्यम आय वाले देशों में लगभग 70 प्रतिशत और उच्च आय देशों में 20 प्रतिशत लोग छोटे खेतों, कम गुणवत्ता वाले स्वरोजगार या माइक्रो-फर्मों में काम करते हैं। इनमें आमतौर पर सीमित औपचारिक प्रशिक्षण और काम सीखने के कम अवसर होते हैं। अनुभव में समान बढ़ोतरी के बावजूद कम व मध्यम आय वाले देशों में वेतन पर नौकरी करने वालों की तुलना में खुद का काम करने वालों की कमाई में बढ़ोतरी आधी ही होती है।’

ये अनुमान पैनल घरों के सर्वे पर आधारित हैं। ये सर्वे वेतन वाली नौकरी और खुद के काम के बीच अदला बदली करने वाले लोगों पर हुआ। भारत के बारे में अनुमान बताते हैं कि भले श्रमिकों की शिक्षा, पहले के अनदेखे अनुभव को ध्यान में रखा जाए लेकिन वेतन वाली नौकरी की तुलना में स्वरोजगार में आमदनी काफी कम होती है।

खुद के काम या छोटी फर्मों में काम करने के दौरान श्रमिक आय (काम से होने वाली कमाई) धीमी गति से बढ़ती है। इसमें यह भी कहा गया कि खुद का काम करने वाले श्रमिकों को अक्सर ज्यादा जटिल कामों या साथियों से सीखने के कम मौके मिलते हैं। इसका कारण यह है कि वे आमतौर पर अकेले काम करते हैं।

वर्ल्ड बैंक ने भारत के ऐसे सबूतों पर भी जोर दिया कि कार्यस्थल पर किए गए बदलाव उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। परिधान उद्योग के श्रमिकों को काम के दौरान सॉफ्ट-स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम ने श्रमिकों की उत्पादकता में 13 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि की जबकि बिना प्रशिक्षण वाले श्रमिकों की उत्पादकता में लगभग 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। यह कार्यस्थल में ज्ञान के प्रसार का संकेत है।

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