भोपाल। मध्य प्रदेश के सिवनी जिला मुख्यालय के तिलक वार्ड स्थित लडैया मोहल्ला में दूषित पेयजल आपूर्ति का मामला अब प्रदेश सरकार तक पहुंच गया है। मध्य प्रदेश शासन के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) तथा जल संसाधन विभाग के आला अधिकारी अब इस मामले की जानकारी गंभीरता से ले रहे हैं। सिवनी निवासी शिकायतकर्ता विजय नंदन द्वारा लगातार जनहित में प्रस्तुत शिकायतों, आरटीआई आवेदनों तथा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के आधार पर संबंधित विभागों ने मामले को संज्ञान में लिया है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, मई और जून 2026 के दौरान नागरिकों को कई दिनों तक गंदा एवं दूषित पेयजल उपलब्ध कराया गया। शिकायत के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा जल नमूना एकत्र कर जिला जल परीक्षण प्रयोगशाला, सिवनी में परीक्षण कराया गया। जारी जल परीक्षण रिपोर्ट में भौतिक एवं रासायनिक मानकों के साथ जीवाणु संबंधी परीक्षण का भी उल्लेख किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तथा भारतीय मानक ब्यूरो (BIS IS 10500:2012) के अनुसार सुरक्षित पेयजल में प्रत्येक 100 मिलीलीटर नमूने में E. coli तथा Total Coliform का स्तर शून्य (0/100 ml) होना चाहिए। इसी मानक के संदर्भ में शिकायतकर्ता ने यह प्रश्न उठाया है कि प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई परीक्षण पद्धति, नमूना संग्रह, परीक्षण प्रक्रिया तथा रिपोर्ट में अंकित जीवाणु संबंधी निष्कर्षों की पूर्ण जानकारी सार्वजनिक की जाए।
शिकायतकर्ता ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत विस्तृत जानकारी मांगी है, जिसमें जल परीक्षण की मूल लैब रिपोर्ट, परीक्षण पद्धति (Method of Test), प्रयोगशाला अभिलेख, गुणवत्ता नियंत्रण रिकॉर्ड, नमूना संग्रह पंचनामा, निरीक्षण रिपोर्ट, प्रयोगशाला रजिस्टर की प्रमाणित प्रतियां तथा संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण शामिल है।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत सरकार ‘जल जीवन मिशन’ एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘हर घर स्वच्छ जल’ संकल्प के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर कार्य कर रही है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में पेयजल गुणवत्ता को लेकर शिकायतें प्राप्त होती हैं, तो उनका वैज्ञानिक परीक्षण तथा पूर्ण पारदर्शिता के साथ समाधान किया जाना आवश्यक माना जाता है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या विभाग पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि पेयजल गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच, वैज्ञानिक तथ्यों का खुलासा तथा आम नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका मानना है कि यदि जांच रिपोर्ट, प्रयोगशाला अभिलेख तथा परीक्षण प्रक्रिया सार्वजनिक होती है तो भविष्य में भी पेयजल गुणवत्ता की निगरानी अधिक प्रभावी हो सकेगी।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मध्य प्रदेश शासन के संबंधित विभाग, जिला प्रशासन तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग इस मामले में आगे क्या कार्रवाई करते हैं और क्या जांच से संबंधित सभी अभिलेख सार्वजनिक किए जाते हैं। शिकायतकर्ता ने कहा है कि, यदि मामले की जांच में लापरवाही बरती गई तो वे उच्च स्तर पर इस विषय को उठाएंगे।

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