नई दिल्ली
फीफा विश्व कप 2026 का काउंड डाउन जारी है। 11 जून (भारतीय समयानुसार 12 जून) 2026 से फुटबॉल के इस महाकुंभ की शुरुआत होगी और फाइनल 19 जुलाई को खेला जाएगा। टूर्नामेंट की मेजबानी संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको संयुक्त रूप से कर रहे हैं।
फीफा विश्व कप 2026 में 48 टीमों के बीच 104 मैच खेले जाएंगे। इन टीमों को 4-4 के 12 ग्रुप में बांटा गया है। 11 जून से 27 जून तक ग्रुप स्टेज के मैच होंगे। 28 जून से 3 जुलाई तक राउंड ऑफ 32, 4 से 7 जुलाई तक राउंड ऑफ 16 के मुकाबले खेले जाएंगे। क्वार्टर फाइनल 9 से 11 जुलाई तक होगा। इसके बाद सेमीफाइनल 14 और 15 जुलाई, तीसरे स्थान का मैच 18 जुलाई को होगा।
बिना जूतों के उतरी भारतीय टीम
आइए इस बीच आपको भारतीय मेंस फुटबॉल टीम के एक ब्लैक एंड व्हाइट दौर में ले चलते हैं। भारतीय फुटबॉल टीम ने 1948 के लंदन ओलंपिक (London Olympics 1948) में डेब्यू किया। यह टीम फ्रांस के खिलाफ मैच के लिए नंगे पैर मैदान पर उतरी थी। ऐसे में कई बार सोशल मीडिया पर दावे किए जाते हैं कि प्लेयर्स के पास जूते खरीदने के पैसे नहीं थे।
सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता भी बहुत कम थी। इस मैच में भारत को 1-2 से हार का सामना करना पड़ा था। स्वतंत्र भारत की ओर से पहला इंटरनेशनल फुटबॉल गोल सरंगापानी रमन ने इसी मैच में किया था। तब भारत के कोच बलेदास चटर्जी थे।
अपनी मर्जी से नहीं पहले जूते
ओलंपिक की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित 'ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल' के बारे में एक डिटेल्ड ब्रीफिंग में यह उल्लेख किया गया है कि 31 जुलाई, 1948 को आयोजित मैच के दौरान भारतीय टीम के 11 में से 8 प्लेयर्स ने अपनी मर्जी से जूते नहीं पहने थे।
हम भारत में फुटबॉल खेलते हैं
भारतीय टीम के तब के कप्तान तालीमेरेन एओ (Talimeren Ao) ने अपनी टीम के नंगे पैर खेलने के बारे में कहा, "हम भारत में फुटबॉल खेलते हैं, जबकि आप लोग बूटबॉल खेलते हैं।" माना जाता है कि 8 खिलाड़ियों ने पूर्वी लंदन के क्रिकलफील्ड स्टेडियम के गीले और फिसलन भरे मैदान पर बिना जूते के खेलना पसंद किया। 1953 तक फीफा जैसे कई इंटरनेशनल टूर्नामेंटों में मैचों के दौरान जूते पहनने के बारे में कोई नियम नहीं थे।
भारतीय फुटबॉल का गोल्डन एज
भारत ने इसके बाद लगातार तीन ओलंपिक खेले। इनमें हेल्सिंकी 1952, मेलबर्न 1956 और रोम 1960 शामिल हैं।
मेलबर्न में भारतीय फुटबॉल टीम ने इतिहास रचते हुए सेमीफाइनल का टिकट कटाया और सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली एशियाई टीम बनी।
इंडिया ने क्वार्टरफाइनल में मेजबान ऑस्ट्रेलिया को शिकस्त दी थी। इसके बाद सेमीफाइनल में भारत को यूगोस्लाविया से हार मिली।
साथ ही कांस्य पदक मैच में बुल्गारिया से हारने के कारण सैमार बनर्जी की अगुवाई वाली भारतीय टीम मेडल जीतने से चूक गई।
1948 से 1960 के बीच का दौर भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग के रूप में माना जाता है।

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