तेहरान
दुनिया का इंटरनेट क्या अब ईरान के कंट्रोल में जा सकता है? पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट से जुड़ी एक खबर ने टेक दुनिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान अब समुद्र के नीचे बिछी उन इंटरनेट केबल्स पर कंट्रोल बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिनसे दुनिया का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। मामला सिर्फ इंटरनेट स्पीड का नहीं है, बल्कि ग्लोबल डेटा, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड सर्विस और अरबों डॉलर की डिजिटल इकॉनमी का भी है।
शिप्स ही नहीं, इंटरनेट के लिए भी ईरान लेगा टोल?
असल कहानी फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी है. यही वह समुद्री रास्ता है जहां से तेल के बड़े जहाज गुजरते हैं. लेकिन कम लोग जानते हैं कि इसी रास्ते के नीचे दुनिया की कई अहम अंडरसी इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं. यही केबल्स एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को इंटरनेट से जोड़ती हैं।
अब ईरान से जुड़े मीडिया नेटवर्क और IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन इंटरनेट केबल्स से कमाई की जा सकती है. ये ठीक वैसा ही होगा जैसे ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले शिप्स से टोल वसूलने का फैसला किया है।
कुछ रिपोर्ट्स में इसे डिजिटल टोल बूथ जैसा मॉडल बताया गया है. यानी जो विदेशी कंपनियां या नेटवर्क इन केबल्स का इस्तेमाल करेंगे, उनसे फीस ली जा सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से जुड़े मीडिया आउटलेट्स ने दावा किया कि इन केबल्स के जरिए हर दिन भारी मात्रा में डिजिटल ट्रैफिक गुजरता है. इसमें बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड डेटा, सोशल मीडिया ट्रैफिक और AI सर्विस तक शामिल हैं।
समुद्र के नीचे से ट्रैवल करता है डेटा
इस खबर ने इसलिए चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दुनिया पहले ही अंडरसी केबल्स पर बढ़ते खतरे को लेकर परेशान है. इंटरनेट का करीब 95 से 99 प्रतिशत ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर केबल्स से गुजरता है. अगर इनमें बड़ी खराबी आ जाए या जानबूझकर नुकसान पहुंचाया जाए तो कई देशों में इंटरनेट, बैंकिंग और क्लाउड सर्विस पर असर पड़ सकता है।
पोर्ट्स में बताया गया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब सिर्फ तेल का रास्ता नहीं रहा, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी बड़ा सेंटर बन चुका है. यहां कई अहम केबल्स गुजरती हैं जो एशिया और यूरोप को जोड़ती हैं।
क्या टेक कंपनियां मानेंगी ईरानी कानून?
मामला सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ईरान फ्यूचर में विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियम मानने के लिए मजबूर कर सकता है. यहां तक कि केबल्स की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम भी अपने नियंत्रण में लेने की बात सामने आई है।
टेक एक्सपर्ट्स का डर यह है कि अगर किसी दिन इन केबल्स पर तनाव बढ़ा या उन्हें नुकसान पहुंचा, तो उसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत समेत एशिया के कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी भी प्रभावित हो सकती है. वीडियो कॉल से लेकर UPI पेमेंट और AI सर्वर तक असर महसूस हो सकता है।
अब दुनिया की चिंता यह है कि अगर भविष्य में इंटरनेट भी तेल की तरह जियोपॉलिटिकल हथियार बन गया, तो हालात कितने बदल सकते हैं. अभी तक देश तेल सप्लाई रोकने की धमकी देते थे, लेकिन आने वाले समय में इंटरनेट केबल्स भी दबाव बनाने का बड़ा जरिया बन सकती हैं।
यानी जिस इंटरनेट को लोग सिर्फ मोबाइल डेटा और WiFi समझते हैं, उसके पीछे समुद्र के नीचे फैला हजारों किलोमीटर लंबा एक ऐसा नेटवर्क है, जिस पर अब दुनिया की राजनीति भी उतर आई है।

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