March 23, 2026

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इनसे सीखिए Success के सही मायने, जिद और जुनून से रच दिया इतिहास

Success story : प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। लाख रुकावट हो, जिद यदि जीतने की हो तो रास्ते खुद ब खुद मंजिल तक पहुंचा देते हैं। कई बार हार का सामना करते हुए इंसान इतना टूट जाता है कि वह निराशा के भंवर में डूबने लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि, सफल होने की इच्छाशक्ति हर निराशा को आशा में बदल देती है। यदि आप भी अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं ​तो बस यह समझ लीजिए कि “असली खेल वहीं से शुरू होता है, जहां लगता है अब सब कुछ खत्म हो गया है…।” हम यहां कुछ ऐसी असली कहानी बता रहे हैं जिन्होंने अपमान के बदले जीतने की जिद और जुनून से कामयाबी का इतिहास रच दिया। यह प्रेरक कहानी आपको जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी…

एक किसान जिसने फेरारी (Ferrari) को दी चुनौती

फेरुशियो लेम्बोर्गिनी (Ferruccio Lamborghini) एक किसान थे जिन्हें मशीनों से गहरा लगाव था। वे पुरानी सैन्य मशीनों को तोड़-जोड़कर ट्रैक्टर के काम लायक बना देते थे। ट्रैक्टर के इस व्यवसाय ने उन्हें बहुत धनवान बना दिया। और अपनी दौलत से उन्होंने कई लग्ज़री गाड़ियां खरीदीं, जिनमें एक फेरारी (Ferrari) भी थी। लेम्बोर्गिनी ने महसूस किया कि फेरारी बहुत शोरगुल करती है, सड़क पर उसकी पकड़ खुरदुरी है और भीतर का क्लच (clutch) बार-बार खराब होता है।

उस ज़माने में (1960 का दशक) एन्ज़ो फेरारी (Enzo Ferrari) की गाड़ियां शिखर पर थीं। लेकिन लेम्बोर्गिनी एक अच्छे मैकेनिक थे। उन्होंने सोचा फेरारी को उनकी गाड़ी की खामियां बताना उनकी मदद होगी। एन्ज़ो को किसान का यह सुझाव पसंद नहीं किया। उन्होंने लेम्बोर्गिनी का अपमान करते हुए कहा, “तुम बस एक किसान हो। तुम्हें मेरी गाड़ियों के बारे में कुछ नहीं पता।”

लेम्बोर्गिनी ने उस अपमान को अपनी ऊर्जा बना लिया। 4 महीने में उन्होंने अपनी पहली गाड़ी बनाई। एक साल से भी कम समय में 13 गाड़ियो बिक गईं। 1960 के दशक के अंत तक लेम्बोर्गिनी, फेरारी के लगभग बराबर शक्तिशाली और धनवान बन चुके थे। फेरारी की गलती थी कि उसने अपना घमंड नहीं छोड़ा, रचनात्मक आलोचना को स्वीकार नहीं किया।

अपमान : जिन्होंने रचे इतिहास

दुनिया के कुछ सबसे बड़े निर्माण किसी प्रतिभा से नहीं, बल्कि किसी ना किसी अपमान से शुरू हुए हैं। लेम्बोर्गिनी की कहानी इसका सबसे चमकीला उदाहरण है। एक किसान को “किसान” कहकर टाल दिया गया और उसी किसान ने एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जो आज भी फेरारी को चुनौती देता है।

देखा जाए तो अपमान दो काम कर सकता है या तो तोड़ सकता है या उस आग को जला सकता है जो भीतर सुलग रही हो। लेम्बोर्गिनी के साथ दूसरा हुआ।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम : वह अस्वीकृति जो रॉकेट बनी

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार बताया था कि एयर फोर्स (Air Force) में पायलट बनने का उनका सपना अधूरा रहा, क्योंकि वे चयन में पिछड़ गए। वह “असफलता” उन्हें इसरो (ISRO) ले गई। फिर डीआरडीओ (DRDO)। फिर अग्नि और पृथ्वी मिसाइलें। फिर राष्ट्रपति भवन। यह उनकी उस इच्छाशक्ति का उदाहरण है जो पहली असफलता के कारण उपजी थी। अगर एयर फोर्स ने नौकरी के लिए हां कह दिया होता तो शायद भारत को वह “मिसाइल मैन” नहीं मिलता।

दरअसल, कभी-कभी दरवाज़ा बंद होना किसी बड़े रास्ते की शुरुआत होती है। लेम्बोर्गिनी का फेरारी ने दरवाज़ा बंद किया और कलाम का एयर फोर्स ने। दोनों ने उस बंद दरवाज़े को अपनी पीठ दिखाकर एक नया दरवाज़ा खोला, जिस पर पूरी दुनिया नाज करती है।

फेरारी की तरह सोच यानी अंधापन

हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल (Harvard Business School) के शोध बताते हैं कि जो नेता और संस्थाएं रचनात्मक आलोचना को अस्वीकार करते हैं, वे धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं। इसे कहते हैं हब्रिस सिंड्रोम (Hubris Syndrome) यानी अत्यधिक सफलता के बाद पैदा होने वाला अंधापन।

इसलिए मार्केट से गायब हुआ नोकिया

हम सब जानते हैं नोकिया (Nokia) एक समय दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल ब्रांड था। जब उनके इंजीनियरों ने टचस्क्रीन (touchscreen) का सुझाव दिया तो कंपनी ने इस तरह के सुझाव को नजरअंदाज किया। नोकिया ने फेरारी की तरह सोचा कि, “हम जानते हैं।” नतीजतन परिणाम इतिहास में दर्ज है।

फिल्म “रॉकेट सिंह” : वह सेल्समैन जिसे नकारा गया

2009 में रिलीज फिल्म “रॉकेट सिंह : सेल्समैन ऑफ द ईयर” में हरप्रीत सिंह बेदी, रणबीर कपूर द्वारा अभिनीत एक औसत छात्र है जो एक बड़ी कंपनी में नौकरी पाता है। उसके पास विचार हैं, ईमानदारी है, ग्राहकों की परवाह है, लेकिन उसके बॉस उसे बार-बार नकारते हैं, उसकी हंसी उड़ाते हैं। तो हरप्रीत क्या करता है? उसी दफ्तर की छत पर अपनी खुद की कंपनी खड़ी कर देता है। यह लेम्बोर्गिनी की कहानी का बॉलीवुड संस्करण है।

आलोचना कैसे सुनें और कैसे जवाब दें

लेम्बोर्गिनी की इस कहानी में दो सबक हैं एक फेरारी के लिए और एक लेम्बोर्गिनी के लिए।

फेरारी के लिए : आलोचना सुनना कमज़ोरी नहीं, बुद्धिमत्ता है। जो सुनता है, वह सीखता है और जो नहीं सुनता, वह पीछे रह जाता है।

लेम्बोर्गिनी के लिए : अपमान को ऊर्जा में बदलना एक कला है। लेकिन यह कला उन्हीं के हाथ लगती है जिनके पास पहले से कुछ बनाने का जुनून हो। लेम्बोर्गिनी के भीतर गाड़ी पहले से बन रही थी, फेरारी के शब्दों ने बस उस आग में घी डाला। इतिहास ऐसे “किसानों” से भरा है जिन्हें सिस्टम ने ठुकराया और जिन्होंने अपना सिस्टम खुद बनाया।

वॉल्ट डिज़्नी : जिन पर दुनिया को नाज है

वॉल्टर एलियास डिज्नी (Walt Disney) को एक अखबार से “कल्पनाशक्ति की कमी” के कारण निकाल दिया गया था। बाद में उन्होंने ऐका कर दिखाया कि उनका नाम और काम इतिहास में दर्ज हो गया। आज मिकी माउस के निर्माता और डिज़्नीलैंड तथा वॉल्ट डिज़्नी वर्ल्ड के संस्थापक वॉल्ट डिज़्नी को कौन नहीं जानता। वॉल्ट डिज़्नी (1901-66) एक अमेरिकी फिल्म और टीवी निर्माता थे जिन्होंने एनिमेटेड कार्टून फिल्मों की शुरुआत की और मिकी माउस और डोनाल्ड डक जैसे पात्रों का निर्माण किया। वॉल्टर डिज्नी ने अपनी लगन और कल्पना से दुनिया भर के करोड़ों लोगों के बचपन में रंग भर दिया। वे सिर्फ मिकी माउस के जनक ही नहीं, बल्कि आधुनिक एनिमेशन उद्योग के पिता और एक ऐसे सपनों के साम्राज्य के निर्माता थे, जो आज भी अरबों दिलों पर राज करता है।

स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) : जिन्हें कंपनी ने किया था बाहर

स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) को उसी एप्पल (Apple) से बाहर कर दिया गया था जो उन्होंने खुद बनाई थी। 1985 में स्टीव जॉब्स को एप्पल से इसलिए बाहर किया गया क्योंकि तत्कालीन सीईओ जॉन स्कली और बोर्ड के साथ उनके गंभीर मतभेद थे। मैकिन्टोश की खराब बिक्री, उनके उग्र प्रबंधन शैली और कंपनी की दिशा को लेकर असहमति के कारण बोर्ड ने उन्हें मैकिन्टोश डिवीजन से हटा दिया, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। हटाए जाने के बाद, जॉब्स ने NeXT नामक एक नई कंपनी शुरू की। इसके बाद पुन: एप्पल में वापसी हुई।

स्टीव जॉब्स एक अमेरिकी बिजनेस टाईकून और आविष्कारक थे। वे एप्पल इंक के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे। स्टीव जॉब्स एक ऐसे शख्स थे, जिनके कद के बराबर टेक जगत में कोई भी नहीं पहुंच पाया है। उनके काम करने का तरीका और व्यक्तित्व बिल गेट्स जैसे दूसरे टेक महारथियों से बिलकुल अलग था।

बड़ी सीख : अपना सिस्टम खुद बनाइए

जब सिस्टम आपको नकारे तो अपना सिस्टम खुद बनाइए। गुस्से से या बदले की भावना से बड़ी चीज़ें नहीं बनतीं, बल्कि कुछ कर दिखाने के जुनून से बनती हैं। हमेशा यह सोच रखें कि, जब कोई आपको छोटा दिखाने की कोशिश करे तो यह उसकी सोच और नजरिया का स्तर है, आपकी नहीं। अगर उस पल आपके भीतर कुछ जल उठे तो उस आग को संभालकर रखिए, क्योंकि उससे लेम्बोर्गिनी बनते हैं।

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