June 17, 2026

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अमेरिका-ईरान महाजंग : 3 महीने चली तबाही ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया, जानिए विनाशकारी तबाही का हिसाब-किताब

मिडल ईस्ट में पिछले तीन महीनों से बारूद की जो भीषण आग सुलग रही थी, वह आखिरकार कूटनीतिक समझौतों और एक बड़े युद्धविराम के बाद ठंडी पड़ी है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच 100 से ज्यादा दिनों तक चली यह आर-पार की जंग इतिहास के पन्नों में तबाही के एक खौफनाक अध्याय की तरह दर्ज हो चुकी है.

इस दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से लेकर दोनों देशों के सैन्य ठिकानों तक सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन्स की गूंज थी. अब जब दोनों पक्ष समझौते की मेज पर आ चुके हैं, तो सबसे बड़ा और जरूरी सवाल यह उठता है कि इस विनाशकारी युद्ध में आखिर सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ? और इस जंग ने कितने बेकसूरों की जान ली?

जान-माल का भारी नुकसान

किसी भी युद्ध की सबसे भयानक कीमत वहां के आम नागरिकों और सैनिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. इस 3 महीने की महाजंग में भी ऐसा ही हुआ. ग्राउंड रिपोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों के मुताबिक, इस युद्ध में दोनों तरफ से हजारों लोगों की जान गई है. ईरान के रिपब्लिकन गार्ड्स (IRGC) के ठिकानों, सैन्य डिपो और रणनीतिक तेल टर्मिनलों पर हुए अमेरिकी हवाई हमलों में बड़ी संख्या में ईरानी सैनिकों और कमांडरों की मौत हुई.

जंग के पहले ही दिन ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत

28 फरवरी को युद्ध के पहले ही दिन ईरान को तब सबसे बड़ा झटका लगा था जब उनके सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई. युद्ध क्षेत्र के आस-पास के इलाकों में रहने वाले सैकड़ों आम नागरिक भी गोलाबारी की चपेट में आ गए. दूसरी ओर, ईरान और उसके सहयोगी समूहों जैसे हिज्बुल्लाह और अन्य मिलिशिया, द्वारा सीरिया, इराक और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी मिलिट्री बेसों पर किए गए आत्मघाती ड्रोन और मिसाइल हमलों में कई अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी और दर्जनों घायल हुए. आंकड़ों की मानें तो इस जंग में सीधे या परोक्ष रूप से मरने वालों की संख्या हजारों में पहुंच गई है, जो इस बात का सबूत है कि मिडल ईस्ट में कितनी हिंसक तबाही मची थी.

किस देश के कितने लोग मारे गए?

  1. ईरान: यहां सबसे ज्यादा 3,468 से 6,000 से अधिक लोग मारे गए. ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय/HRANA के अनुसार मृतकों की संख्या कम से कम 3,636 है (1,221 सैनिक और 1,701 नागरिक), जबकि अमेरिका और इजरायल का अनुमान इसे 6,000 से पार बताता है.
  2. लेबनान: स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक कुल 3,756 लोगों की जान गई, जिनमें बड़ी संख्या में नागरिक थे. इसके साथ ही हिज्बुल्लाह के 1,000 से 1,700 लड़ाकों के मारे जाने का भी दावा है.
  3. इराक: यहां कम से कम 119 लोग मारे गए, जिनमें पीएमएफ (PMF) के लड़ाके और आम नागरिक दोनों शामिल हैं.
  4. इजरायल: कुल 61 लोगों की मौत हुई, जिनमें 32 सैनिक, 29 नागरिक शामिल हैं.
  5. अमेरिका: अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार यहां के 13 से 15 सैनिकों की मौत हुई.
  6. संयुक्त अरब अमीरात (UAE): कुल 13 लोगों की जान गई, जिनमें 2 सैनिक और 11 नागरिक थे.
  7. वेस्ट बैंक: इस संघर्ष के दौरान यहाँ 14 लोगों की मौत दर्ज की गई.
  8. कुवैत: यहां कुछ दर्जन लोग हताहत हुए, जिनमें से 4 सैनिकों और 7 नागरिकों की मौत के पक्के आंकड़े मिले हैं.
  9. सऊदी अरब: यहां से 3 आम नागरिकों के मारे जाने की रिपोर्ट है.
  10. भारत: इस जंग से भारत भी अछूता नहीं रहा. जंग के बीच खाड़ी देशों में रहने वाले कई भारतीयों की मौत हुई. इस संघर्ष का असर सीधे भारतीय नागरिकों तक पहुंचा. इसके अलावा समुद्री हमलों में 7 भारतीय नाविक भी मारे गए.

कितना हुआ आर्थिक नुकसान?

अगर नुकसान के आर्थिक मोर्चे को देखें, तो दोनों ही देशों की जेब पर भारी असर पड़ा है, लेकिन इसके आयाम अलग-अलग हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों और लगातार चली बमबारी के कारण ईरान के तेल निर्यात के बुनियादी ढांचे को सबसे ज्यादा चोट पहुंची. ईरान का मुख्य तेल टर्मिनल, जहां से उसकी अर्थव्यवस्था की सांसें चलती हैं, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण महीनों तक ठप रहा. देश के भीतर महंगाई तीन अंकों में पहुंच गई, लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं और आम जनता के लिए राशन-पानी जुटाना भी दूभर हो गया.

अमेरिका और वैश्विक बाजार पर असर

अमेरिका के लिए यह जंग अरबों डॉलर के सैन्य खर्च का सबब बनी. पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम और लड़ाकू विमानों के लगातार इस्तेमाल ने अमेरिकी खजाने पर भारी बोझ डाला. सबसे बड़ा नुकसान वैश्विक सप्लाई चेन को हुआ. होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिससे अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी का खतरा मंडराने लगा. इस जंग में सबसे बड़ा नुकसान ईरान के आम नागरिकों को उठाना पड़ा, जिन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. वहीं अमेरिका को अपनी सैन्य साख और वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी. ये युद्ध अमेरिका के लिए काफी नुकसानदेह साबित हुआ. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इसमें 13 से 15 अमेरिकी सैनिक मारे गए और 381 से 543 सैनिक घायल हुए. साथ ही, कम से कम 42 अमेरिकी विमान या तो क्षतिग्रस्त हो गए या पूरी तरह नष्ट हो गए. अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले के अगले ही दिन, यानी 1 मार्च को, कुवैत में एक ड्रोन हमले में 6 और सैनिकों की जान चली गई. इसके अलावा, एक KC-135 रिफ्यूलिंग विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से चालक दल के 6 सदस्यों की मौत हो गई. इसी दौरान, एक बड़ी चूक में कुवैती एयर डिफेंस ने गलती से अमेरिका के ही 3 F-15E लड़ाकू विमानों को मार गिराया.

किसने क्या खोया और क्या पाया?

इस जंग का अंत जिस समझौते के साथ हुआ, उसे देखकर कई विश्लेषक हैरान हैं. ईरान अपने $4 अरब डॉलर के फ्रीज फंड को वापस पाने और व्यापारिक पाबंदियों में ढील लेने में कामयाब रहा. अमेरिका, जो शुरुआत में ईरान को पूरी तरह घुटनों पर लाने की जिद पर अड़ा था, उसे वैश्विक तेल संकट और अंतहीन दलदल में फंसने के डर से अपने कदम पीछे खींचने पड़े. नुकसान के अंतिम आकलन में यह साफ है कि बुनियादी ढांचे और इंसानी जिंदगियों के मामले में ईरान की जमीन पर ज्यादा खून बहा और तबाही मची. लेकिन रणनीतिक और राजनीतिक मोर्चे पर, अमेरिका की ‘डीलमेकर’ वाली छवि को गहरा धक्का लगा है, क्योंकि उसे एक जिद्दी और प्रतिबंधों से घिरे देश के सामने झुककर समझौता करना पड़ा.

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