क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलने वाली है? पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने की उम्मीदों ने कच्चे तेल के बाजार में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें युद्ध के दौरान बने ऊंचे स्तर से नीचे आ चुकी हैं, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश को राहत मिलने की संभावना बढ़ गई है। सोमवार को कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। अगर हालात सामान्य रहते हैं, तो न सिर्फ पेट्रोल-डीजल की लागत पर दबाव घटेगा, बल्कि सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान में भी कमी आ सकती है।
पीटीआई रिपोर्ट के मुताबिक, हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होने या फिर से शुरू होने से भारत को बड़ी राहत मिल सकती है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल भारत के लिए इससे तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं कम होंगी, माल ढुलाई लागत घटेगी और महंगाई पर दबाव कम पड़ सकता है।
ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक तेल खपत के लगभग पांचवें हिस्से की आवाजाही का जरिया है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर जैसे प्रमुख खाड़ी देशों का तेल निर्यात इसी रास्ते से होता है और ये सभी भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता हैं।
फरवरी के अंत में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से इस जलडमरूमध्य के जरिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई थी। कच्चा तेल पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है, जबकि प्राकृतिक गैस बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, सीएनजी और घरेलू रसोई गैस के लिए उपयोग की जाती है। आपूर्ति बाधित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई दरों में तेज बढ़ोतरी हुई थी।
भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को मिलेगी राहत
इंडस्ट्री सूत्रों और विश्लेषकों का कहना है कि Strait of Hormuz के दोबारा खुलने और तनाव कम होने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता आएगी और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को राहत मिलेगी। रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम समझौते की घोषणा के बाद तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। ट्रंप ने कहा कि समझौते के तहत हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों को ‘टोल-फ्री’ आवाजाही की अनुमति होगी।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, “मैं हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शुल्क के पूरी तरह खोलने की अनुमति देता हूं और साथ ही अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को तत्काल हटाने की मंजूरी देता हूं। दुनिया के जहाज अपने इंजन चालू करें। तेल को बहने दें।”
क्रूड की कीमतों में 4% से ज्यादा गिरावट
युद्धविराम की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 4 फीसदी गिरकर लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। युद्ध से पहले फरवरी में वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 70-72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो संघर्ष के दौरान बढ़कर 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इससे पेट्रोल और डीजल उत्पादन की लागत बढ़ गई, लेकिन सरकार ने मई के मध्य तक खुदरा कीमतों में संशोधन नहीं किया।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। चुनावों के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, जबकि सीएनजी के दाम 6 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़े। एलपीजी सिलेंडर की कीमत भी दो किस्तों में 89 रुपये प्रति 14.2 किलोग्राम बढ़ाई गई। कीमतें बढ़ाने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों को अभी भी प्रतिदिन लगभग 650 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है क्योंकि खुदरा कीमतें लागत से पीछे चल रही हैं।
इंडस्ट्री सूत्रों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें नरम रहती हैं और हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहता है, तो यह नुकसान धीरे-धीरे कम हो सकता है। एक इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा कि सरकारी ईंधन कंपनियों को एक तिमाही में उतना नुकसान हुआ जितना उन्होंने पूरे वर्ष में मुनाफा कमाया था। अगर समझौता कायम रहता है तो ऊर्जा आपूर्ति आसान होगी और कीमतों में भी नरमी आएगी।
रुकावटों से निपटने के लिए भारत की तैयारी
युद्ध से पहले भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 88 फीसदी से अधिक आयात करता था, जिसमें से लगभग आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता था और उसकी आपूर्ति हॉर्मुज के रास्ते होती थी।
देश अपनी एलपीजी जरूरत का लगभग 60 फीसदी आयात करता था, जिसमें से 90 फीसदी आपूर्ति इसी मार्ग से होती थी। वहीं प्राकृतिक गैस की कुल जरूरत का लगभग आधा हिस्सा आयात किया जाता था, जिसमें से 65 फीसदी कतर और यूएई जैसे देशों से आता था। युद्ध के कारण कतर से एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई।
इसके चलते प्राकृतिक गैस आवंटन को तर्कसंगत बनाया गया और कुछ उपभोक्ता वर्गों के लिए आपूर्ति में कटौती की गई। एलपीजी की कमी के कारण पहले होटल और रेस्तरां जैसे व्यावसायिक उपभोक्ताओं की आपूर्ति रोकी गई और बाद में उनकी जरूरत का लगभग 70 फीसदी हिस्सा बहाल किया गया। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस सिलेंडर की रीफिल बुकिंग अवधि भी बढ़ाई गई।
सरकार ने दूसरे देशों से बढ़ाई तेल खरीद
सरकार और रिफाइनरियों ने खाड़ी देशों के अलावा रूस, अफ्रीका, अमेरिका और लैटिन अमेरिका से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने के प्रयास किए ताकि मध्य पूर्व से आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध रहें। प्राकृतिक गैस आयातकों ने भी अतिरिक्त आपूर्ति स्रोतों की तलाश की और एलएनजी के स्पॉट बाजार पर करीबी नजर रखी।
सरकार ने ईंधन आपूर्ति चेन में स्टॉक की स्थिति की समीक्षा की और तेल विपणन कंपनियों के साथ मिलकर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और विमानन ईंधन का पर्याप्त भंडार सुनिश्चित किया। पिछले सप्ताह सरकार ने पेट्रोल पंपों से पेट्रोल और डीजल की थोक खरीद पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान भी अधिसूचित किया था ताकि स्थानीय स्तर पर संभावित कमी और ईंधन की हेराफेरी को रोका जा सके।
इंडस्ट्री के जुड़े लोगों ने बताया कि तेल कंपनियों ने वैकल्पिक शिपिंग मार्गों, जहाजों की उपलब्धता और कार्गो शेड्यूलिंग से जुड़ी आपातकालीन योजनाओं की भी समीक्षा की।
Strait of Hormuz खुलने से क्या होगा फायदा?
इंडस्ट्री सूत्रों का कहना है कि अगर हॉर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही बिना रुकावट जारी रहती है तो तेल आपूर्ति में देरी का जोखिम कम होगा और रिफाइनरियां अपनी खरीद योजनाओं को बेहतर तरीके से संचालित कर सकेंगी। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट इसका सबसे बड़ा और तत्काल लाभ होगा। तेल की कीमतों में हर स्थायी गिरावट भारत के आयात बिल को कम करती है, रुपये को मजबूती देती है, चालू खाते के घाटे को घटाती है और महंगाई के दबाव को कम करती है।
भारतीय रिफाइनरियों को कम माल ढुलाई और बीमा लागत का भी फायदा मिलेगा। ईंधन की लागत घटने से परिवहन खर्च कम होगा, मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव घटेगा और खाद्य पदार्थों से लेकर कंस्ट्रक्शन सामग्री तक विभिन्न उत्पादों की कीमतों में नरमी आ सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि हॉर्मुज में सामान्य स्थिति बहाल होने से नीति निर्माताओं को भी राहत मिलेगी। खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक जोखिम कम होने से सरकार को ऊर्जा और आर्थिक नीतियों के प्रबंधन, महंगाई नियंत्रण और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने में अधिक लचीलापन मिलेगा। इसका सबसे ज्यादा लाभ एविएशन, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, शिपिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को मिल सकता है, क्योंकि ये सभी ऊर्जा लागत पर काफी हद तक निर्भर हैं।

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