नई दिल्ली. जून माह के बीस दिन बीत जाने के बावजूद कई राज्यों में अपेक्षित वर्षा नहीं हुई है। किसान और आमजन आसमान पर नजरें टिकाए हुए हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में लोग उमस और भीषण गर्मी से परेशान हैं। मानसून की धीमी रफ्तार ने किसानों, जल संसाधन विशेषज्ञों और आम नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। वर्षा की कमी का असर कृषि गतिविधियों के साथ-साथ जल भंडारण पर भी पड़ने लगा है।
23 जून के बाद फिर सक्रिय होगा मानसून
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशि कांत के अनुसार वर्तमान में मानसून की प्रगति कुछ दिनों के लिए धीमी पड़ गई है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि 23 जून के आसपास अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में अनुकूल परिस्थितियां बनने लगेंगी, जिससे मॉनसून दोबारा सक्रिय होगा। इसके बाद महाराष्ट्र, मध्य भारत और उत्तर भारत के कई हिस्सों में वर्षा की गतिविधियों में तेजी आने की संभावना है। मौसम विभाग को उम्मीद है कि यह नया चरण मानसून की गति को फिर से मजबूत करेगा।
अरब सागर में बादल न बनने से आई रुकावट
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की वर्तमान सुस्ती का प्रमुख कारण अरब सागर के ऊपर पर्याप्त बादल तंत्र का विकसित न हो पाना है। सामान्य परिस्थितियों में अरब सागर से उठने वाली नमी और बादलों का समूह पश्चिमी और मध्य भारत में व्यापक वर्षा का कारण बनता है। इस बार आवश्यक क्लाउडिंग विकसित नहीं होने से मॉनसून की ऊर्जा कमजोर पड़ गई और उसकी प्रगति कई राज्यों में रुक सी गई। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में बारिश की बजाय तेज गर्मी और उमस का सामना करना पड़ रहा है।
वर्षा के आंकड़े दिखा रहे हैं चिंताजनक तस्वीर
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के ताजा आंकड़े इस वर्ष मॉनसून की कमजोर शुरुआत की पुष्टि करते हैं। एक जून से उन्नीस जून के बीच देशभर में औसत से 41 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। जहां सामान्य रूप से इस अवधि में लगभग 86.7 मिलीमीटर वर्षा होती है, वहीं इस बार केवल 51.5 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई। यह अंतर न केवल मौसम वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है बल्कि कृषि क्षेत्र के लिए भी गंभीर संकेत माना जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में वर्षा सामान्य नहीं होती है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित
वर्षा की कमी का सबसे अधिक असर मध्य भारत में देखने को मिला है। आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र में सामान्य से लगभग 64 प्रतिशत कम बारिश हुई है। यह स्थिति कृषि प्रधान राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि जून का महीना बुवाई की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। पर्याप्त नमी नहीं मिलने से खेतों की तैयारी और फसल चक्र प्रभावित हो सकता है। मौसम विभाग हालांकि आश्वस्त है कि आगामी सप्ताह में वर्षा की गतिविधियां बढ़ने से इस कमी की आंशिक भरपाई संभव हो सकती है।
पूर्वोत्तर और दक्षिणी क्षेत्रों में भी सामान्य से कम वर्षा
पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में भी वर्षा सामान्य से काफी कम रही है। इन क्षेत्रों में लगभग 45 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में यह कमी 22 प्रतिशत रही। उत्तर-पश्चिम भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, लेकिन वहां भी सामान्य से 4 प्रतिशत कम वर्षा रिकॉर्ड की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मॉनसून अगले कुछ दिनों में सक्रिय होता है तो देश के अधिकांश हिस्सों में वर्षा की स्थिति सुधर सकती है और जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव कम हो सकता है।
किसानों और आमजन की निगाहें आसमान पर
देश के करोड़ों किसान अब मॉनसून की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। खरीफ सीजन की सफलता काफी हद तक जून और जुलाई की वर्षा पर निर्भर करती है। दूसरी ओर शहरों में रहने वाले लोग भी गर्मी और उमस से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। मौसम विभाग का ताजा पूर्वानुमान राहत देने वाला जरूर है, लेकिन आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि इस वर्ष का मानसून सामान्य रहेगा या फिर बारिश की कमी लंबे समय तक चिंता का कारण बनी रहेगी।

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