दिल्ली हाईकोर्ट में अरविंद केजरीवाल से जुड़े कोर्टरूम वीडियो मामले की सुनवाई के दौरान गूगल और मेटा ने साफ कहा कि वे किसी वीडियो या पोस्ट की स्वतः निगरानी नहीं कर सकते। दोनों कंपनियों ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में कहा कि अगर किसी कंटेंट की शिकायत मिलती है या अदालत का आदेश आता है, तो कानून के मुताबिक उस सामग्री को हटाया जाता है। लेकिन हर पोस्ट और वीडियो पर पहले से नजर रखना उनके लिए संभव नहीं है।
किस मामले को लेकर हुई सुनवाई?
यह मामला 13 अप्रैल को हुई अदालत की कार्यवाही की कथित अनधिकृत रिकॉर्डिंग और उसके सोशल मीडिया पर प्रसार से जुड़ा है। वकील वैभव सिंह ने इस संबंध में जनहित याचिका दायर कर कई नेताओं और अन्य लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की है। याचिका में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत कई राजनीतिक नेताओं के नाम शामिल हैं।
Meta ने क्या दलील दी?
मेटा ने अदालत से कहा कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हर दिन अरबों पोस्ट साझा किए जाते हैं। ऐसे में किसी विशेष वीडियो या पोस्ट की पहचान बिना उसके URL या स्पष्ट जानकारी के करना व्यावहारिक नहीं है। कंपनी ने यह भी कहा कि वह “सुपर सेंसर” की भूमिका नहीं निभा सकती और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत उसे तभी कार्रवाई करनी होती है, जब किसी वैध अदालत या अधिकृत एजेंसी का आदेश मिले।
Google ने भी रखी अपनी बात
गूगल ने कहा कि यूट्यूब पर हर घंटे दुनिया भर से लाखों वीडियो अपलोड होते हैं। ऐसे में सभी वीडियो की स्वतः निगरानी करना और यह तय करना कि कौन-सा कंटेंट कानूनी रूप से आपत्तिजनक है, संभव नहीं है।
रवीश कुमार ने दी सफाई
पत्रकार रवीश कुमार ने अपने जवाब में कहा कि उन्होंने कोई वीडियो अपलोड नहीं किया। उनका कहना है कि उन्होंने केवल पहले से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री पर पत्रकारिता के तहत टिप्पणी की थी और उनकी पोस्ट में अदालत या न्यायाधीश के खिलाफ कोई अपमानजनक टिप्पणी नहीं थी।
27 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
न्यायमूर्ति वी.के. राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी.एस. अरोड़ा की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त के लिए तय की है। अदालत ने कहा कि कुछ प्रतिवादियों को अभी तक नोटिस तामील नहीं हुए हैं। इस बीच, अदालत की कार्यवाही के वीडियो के अनधिकृत प्रसार और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी को लेकर यह मामला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

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