August 6, 2026

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MP हाईकोर्ट का अहम फैसला : फतवे को आधार बनाकर नहीं मिल सकती तलाक की डिक्री

भोपाल . मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक संस्था या सेमिनरी की ओर से जारी फतवा फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री हासिल करने का कानूनी आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने मामले में पति की ओर से दाखिल सिविल याचिका को खारिज कर दिया।

मामला सैयद सामी अली और डॉ. शाजिया नवाज खान से जुड़ा है। दोनों पति-पत्नी करीब दो वर्षों से अलग रह रहे हैं। इस दौरान पति ने पत्नी से जुड़ी कई शिकायतों का उल्लेख करते हुए भोपाल की दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी से संपर्क किया था। उन्होंने कमेटी को पत्र लिखकर तलाक के संबंध में धार्मिक राय मांगी थी।

इसके बाद दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी की ओर से पति के आवेदन पर जवाब दिया गया। सैयद सामी अली ने इसी जवाब को आधार बनाते हुए भोपाल की फैमिली कोर्ट में तलाक से संबंधित याचिका दाखिल की। पति का तर्क था कि धार्मिक संस्था की ओर से दी गई राय के आधार पर तलाक को मान्यता दी जानी चाहिए।

हालांकि, मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी धार्मिक संस्था की ओर से जारी फतवा अपने आप में फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री लेने का आधार नहीं हो सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई धार्मिक संस्था मुस्लिम पुरुष को इस तरह कानूनी तलाक की डिक्री देने का अधिकार नहीं रखती। तलाक से जुड़े मामले का फैसला कानून और निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने पत्नी डॉ. शाजिया नवाज खान की अर्जी स्वीकार करते हुए पति की सिविल याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने पति को यह स्वतंत्रता दी कि वह कानून के तहत उपलब्ध आधारों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार फैमिली कोर्ट में नए सिरे से तलाक की याचिका दाखिल कर सकता है।

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