September 2, 2026

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चर्चित IAS दिव्या मित्तल का इस्तीफा, ​दिल छू लेगी भावुक पोस्ट; प्रोफाइल किसी चमत्कार से कम नहीं

Udaan Desk. उत्तर प्रदेश कैडर की तेजतर्रार और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। वर्ष 2013 बैच की आईएएस अफसर दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा से खुद को अलग करने का फैसला लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बेहद भावुक और लंबी पोस्ट लिखी है। वर्तमान में वह यूपी सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर कार्यरत थीं। सोशल मीडिया पर अपनी विदाई पोस्ट के माध्यम से उन्होंने अपने 13 साल के सफर को विराम देने की घोषणा की है।

लंदन की नौकरी और भारत लौटने की दिलचस्प कहानी
दिव्या मित्तल ने अपने करियर और पढ़ाई को लेकर सोशल मीडिया पर विस्तृत जानकारी साझा की है। एक साधारण परिवेश में पली-बढ़ीं दिव्या ने दिन-रात एक कर आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उनका चयन लंदन में नौकरी करने के लिए हुआ। लेकिन सब कुछ पा लेने के बाद भी उन्हें अपने देश में न होना खलता था।

अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने लिखा कि उन्हें लगता था कि उनका आत्मविश्वास, पढ़ाई और दुनिया में सिर उठाकर चलने की ताकत सब इसी देश की मिट्टी का कर्ज है, जिसे उन्हें चुकाना था। वह चाहती थीं कि जिस भारत का सपना उन्होंने देखा है, उसे बनाने वाली ईंटों पर उनके भी हाथों के निशान हों। इसी चाहत में वह भारत लौट आईं और उन्हें आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला। खास बात यह है कि दिव्या मित्तल के पति गगनदीप भी एक आईएएस अधिकारी हैं। दोनों पढ़ाई पूरी करने के बाद लंदन में नौकरी करने चले गए थे। वहां से लौटकर दोनों ने साथ में यूपीएससी की तैयारी शुरू की और सफलता प्राप्त की।

75 साल बाद गांव में पहुंचाया पानी, लहुरियादह की बूढ़ी अम्मा का आशीर्वाद
दिव्या मित्तल जब मिर्जापुर की जिलाधिकारी थीं, तब उन्होंने एक ऐसा काम किया जिसकी हर तरफ जमकर चर्चा हुई। मिर्जापुर के हलिया ब्लॉक के लहुरियादह गांव में आजादी के 75 साल बीतने के बाद भी पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। दिव्या मित्तल ने कड़े प्रयासों से इस गांव में आजादी के 75 साल बाद पहली बार पीने के पानी की व्यवस्था कराई।

अपनी पोस्ट में उन्होंने इस भावुक पल को याद करते हुए लिखा कि आज भी उनकी आंखों में लहुरिया दह की पहाड़ी की उस वृद्ध मां का दृश्य बसा हुआ है, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोलीं। उस बूढ़ी अम्मा ने बस कांपते हाथों से दिव्या का सिर छूकर आशीर्वाद दिया था। दिव्या मित्तल के अनुसार, भले ही आज उनका प्रशासनिक पद छूट गया है, लेकिन उस वृद्ध मां का स्पर्श और देश की मिट्टी का दिया सपना उनके दिल से कभी नहीं छूटेगा। मिर्जापुर की इस यात्रा ने उन्हें सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बल्कि केवल एक राय है।

‘हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति की गरिमा’
अपनी 13 साल की इस अविस्मरणीय सेवा के दौरान दिव्या मित्तल मिर्जापुर के साथ-साथ देवरिया की भी जिलाधिकारी रहीं, जहां उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाए और सीख लीं। उन्होंने लिखा कि देवरिया ने उन्हें सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना कोई विकल्प नहीं, बल्कि कर्तव्य है। वहीं, मां विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर उन्होंने सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, बल्कि उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है।

उन्होंने यह भी साझा किया कि इस जीवन का असली सुकून उन्हें उन लोगों की आंखों में दिखा जिन्हें पहली बार जमीन का हक मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला और जिस किसान के खेत तक पानी पहुंचा। उन्होंने बेहद संजीदगी से लिखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे वास्तव में एक व्यक्ति होता है, और उसकी गरिमा को बनाए रखना ही सच्चा न्याय है।

सोशल मीडिया पर सक्रियता और विदाई पर आभार
उत्तर प्रदेश कैडर IAS दिव्या मित्तल केवल अपनी तेजतर्रार कार्यप्रणाली के लिए ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता के लिए भी जानी जाती हैं। वह सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहती हैं और हाल ही में उनकी पहली किताब भी बाजार में आई थी। अपनी पोस्ट के अंत में उन्होंने अपने उन सभी सहयोगियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने हर कठिन समय में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें लोगों से इतना प्यार, सम्मान और अपनापन मिला कि उनकी झोली पूरी तरह से भर गई। दिव्या मित्तल का यह इस्तीफा सोशल मीडिया और यूपी के प्रशासनिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

IAS दिव्या मित्तल की एजुकेशन प्रोफाइल?
बता दें कि दिव्या मित्तल ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं को पास किया है। उनका JEE, CAT और UPSC को एक बार नहीं दो बार क्रैक करना किसी चमत्कार से कम नहीं। दिव्या मित्तल ने सबसे पहले IIT दिल्ली से B.Tech किया। चाहती तो इसके बाद वह लाखों की नौकरी कर सकती थीं। लेकिन इसकी बाद उन्होंने केट पास करके IIM बेंगलुरु जैसे टॉप के संस्थान से MBA किया है। फिर लंदन की कंपनी जेपी मॉर्गन में उन्हें लाखों के पैकेज वाली शानदार नौकरी मिल गई। जिसे कुछ समय तक किया भी। लेकिन उनका यहां भी ज्यादा दिन तक मन नहीं लगा। क्योंकि वह अपने देश के लिए कुछ करना चाहती थीं।
दिव्या आखिर भारत लौट आईं। इंडिया आकर उन्होंने IAS बनने का लक्ष्य बनाया और यूपीएससी परीक्षा पास करने के लिए दिन रात मेहनत की। साल 2012 में दिव्या ने UPSC क्रैक किया और उनका सिलेक्शन IPS के लिए हो गया। लेकिन उनको तो आईएएस बनना था, इसलिए उन्होंने तैयारी जारी रखी। एक साल बाद 2013 में आखिर वो IAS बन गईं।

दिव्या मित्तल की मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भावुक पोस्ट

  • “आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर ‘सब कुछ’ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।
  • बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है।
  • मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूँ। सच यह है कि सबसे ज़्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज़ और भी बढ़ता गया। लोग मेरी ख़ुशी में मुझसे ज़्यादा ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे।
  • आज आभार से आँखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध माँ, जो अपने गाँव में पहली बार पानी पहुँचता देख कुछ नहीं बोली, बस काँपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है।”

आपकी अपनी,
दिव्या मित्तल

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