लखनऊ
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार का कैबिनेट विस्तार होने की तैयारी है। लखनऊ से दिल्ली तक यह वीकेंड काफी गहमागहमी वाला रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े अचानक ही लखनऊ पहुंचे और एक के बाद एक कई नेताओं से मुलाकात की। इसके अलावा सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ संगठन महामंत्री धर्मपाल एवं प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मुलाकात हुई। यही नहीं पंकज चौधरी ने दिल्ली में भी मुलाकातें की हैं। माना जा रहा है कि विनोद तावड़े ने सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक एवं केशव प्रसाद मौर्य से मुलाकात की है। इनसे राज्य के कामकाज पर बात की गई और मंत्री बनाए जाने को लेकर भी चर्चा हुई।
यही नहीं विनोद तावड़े की मुलाकात पूर्व प्रदेश अध्यक्षों रमापति राम त्रिपाठी और सूर्यप्रताप शाही से भी हुई। इसके अलावा पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह जैसे नेता भी उनसे मिले। ये सारी बैठकें फीडबैक के लिए हुईं और मंथन हुआ कि कौन से नेता मंत्री बन सकते हैं। इसके अलावा किन लोगों को निगमों, सहकारी संस्थाओं आदि में पद देकर नवाजा जा सकता है। इस बीच चर्चा है कि पश्चिम यूपी से आने वाले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का मंत्री बनना तय है। वह प्रदेश अध्यक्ष पद से हटे हैं और जाट नेता हैं। बिरादरी का पश्चिम यूपी में अच्छा असर है। ऐसे में पार्टी चाहेगी कि उन्हें कोई अहम विभाग देकर समाज में एक संदेश दिया जाए।
6 मंत्रियों के लिए एंट्री की संभावना, कौन हैं रेस में
उत्तर प्रदेश सरकार में फिलहाल 54 मंत्री हैं। इनमें से 21 कैबिनेट मंत्री हैं और 14 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। इसके अलावा 19 राज्यमंत्री हैं। अब भी 6 मंत्री और बन सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा की कुल क्षमता के 15 फीसदी के बराबर का मंत्री परिषद हो सकता है। यूपी में आखिरी कैबिनेट विस्तार मार्च 2024 में हुआ था। सूत्रों का कहना है कि अब होने वाले कैबिनेट विस्तार में कुछ लोगों को सरकार से संगठन में भेजा सकता है। इसके अलावा सालों से संगठन में मेहनत कर रहे कुछ लोग मंत्री पद पा सकते हैं। यही नहीं आयोग और निगमों में भी पद दिए जा सकते हैं।
दिल्ली से लखनऊ तक मंथन, किन्हें मिलेगा जिम्मा और कौन बाहर
कहा जा रहा है कि राज्य में कुछ नियुक्तियों को लेकर दिल्ली और लखनऊ के बीच मतभेद की स्थिति है। ऐसे में इस बार नियुक्तियां ऐसी करने पर विचार हो रहा है कि कहीं भी नाराजगी का स्कोप ना रहे। इसके अलावा मंत्री परिषद के गठन में पश्चिम यूपी पर फोकस करने की तैयारी है। ऐसा इसलिए क्योंकि सीएम, दोनों डिप्टी सीएम और प्रदेश अध्यक्ष में से सभी मध्य अथवा पूर्वी यूपी के हैं। ऐसे में पश्चिम यूपी के किसी नेता को अहमियत मिल सकती है। वहीं सामाजिक समीकरण की बात की जाए तो ओबीसी और दलित के अलावा सवर्ण समाज पर भी फोकस रह सकता है। यूजीसी रूल्स वाले विवाद के बाद सवर्णों में नाराजगी के चर्चे हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार इन्हें 2027 से पहले निश्चित तौर पर साधना चाहेगी।

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