July 7, 2026

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सरकार के इस फैसले से भारतीय Power Transmission कंपनियों की बढ़ी टेंशन

सरकार ने भारत में फैक्टरी लगाने वाली कुछ चीनी कंपनियों को अहम बिजली परियोजनाओं में हिस्सा लेने की मंजूरी दी है। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या इससे भारतीय कंपनियों का कारोबार प्रभावित होगा और क्या ट्रांसफॉर्मर की कीमतों पर दबाव आएगा? हालांकि फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा। जानकारों का कहना है कि भारत में ट्रांसफॉर्मर की मांग अभी भी सप्लाई से काफी ज्यादा है। ऐसे में अगले एक-दो साल तक भारतीय कंपनियों की स्थिति मजबूत बनी रह सकती है।

ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल ने क्वालिटी पावर के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर भरणीधरन पांडियन से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार की मंजूरी के बावजूद चीनी कंपनियों को भारत में अपनी क्षमता बढ़ाने में समय लगेगा। इसलिए निकट भविष्य में बाजार का समीकरण बदलने की उम्मीद नहीं है।

सरकार ने क्या फैसला लिया है?
बिजली मंत्रालय ने भारत में प्रोडक्शन यूनिट रखने वाली चार चीनी कंपनियों को अहम बिजली ट्रांसमिशन परियोजनाओं में बोली लगाने की मंजूरी दी है। लेकिन इसके साथ कुछ शर्तें भी रखी गई हैं। इन कंपनियों को भारत में ही उत्पादन करना होगा और उनके उत्पादों में कम से कम 50 से 60 फीसदी घरेलू सामग्री का इस्तेमाल करना होगा। चीन से सीधे तैयार सामान या केवल पार्ट्स मंगाकर सप्लाई करने की अनुमति नहीं होगी।

सरकार का मकसद ट्रांसफॉर्मर और दूसरे जरूरी उपकरणों की कमी को दूर करना है, क्योंकि इसी वजह से कई बिजली परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं।

ट्रांसफॉर्मर की कमी क्यों बनी हुई है?
रिपोर्ट के मुताबिक, किसी भी बिजली सबस्टेशन में ट्रांसफॉर्मर सबसे अहम उपकरण होता है। इसकी कीमत पूरी परियोजना का छोटा हिस्सा होती है, लेकिन अगर ट्रांसफॉर्मर समय पर नहीं मिले तो बाकी सारे उपकरण तैयार होने के बावजूद पूरी परियोजना अटक जाती है।

यही वजह है कि फिलहाल ट्रांसफॉर्मर बनाने वाली कंपनियों के पास ऑर्डर की कोई कमी नहीं है और मांग लगातार बनी हुई है।

चीनी कंपनियों से तुरंत क्यों नहीं बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा?
रिपोर्ट के मुताबिक, मंजूरी पाने वाली चार कंपनियों में से सिर्फ टीबीईए (TBEA) के पास भारत में ठीक-ठाक उत्पादन क्षमता है। कंपनी की मौजूदा क्षमता करीब 10,000 एमवीए है, जिसे आने वाले वर्षों में 20,000 एमवीए तक बढ़ाया जा सकता है। लेकिन यह भी भारत की जरूरतों के मुकाबले काफी कम है।

बाकी तीन कंपनियों की भारत में मौजूदगी अभी बहुत छोटी है। अगर वे बड़े स्तर पर काम करना चाहती हैं, तो उन्हें नई फैक्टरी, मशीनें और निवेश करना होगा। इसमें समय लगेगा। इसलिए अगले एक-दो साल में इनसे भारतीय कंपनियों को बड़ा खतरा नहीं माना जा रहा।

क्या कीमतों पर पड़ेगा असर?
मोतीलाल ओसवाल का मानना है कि फिलहाल कीमतों में किसी बड़ी गिरावट की संभावना नहीं है। नई क्षमता लगाने में काफी पैसा और समय लगेगा। ऐसे में चीनी कंपनियों के लिए बहुत कम कीमत पर सामान बेचकर बाजार पर कब्जा करना आसान नहीं होगा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन की कुछ कंपनियां अभी भी भारत में जिन उपकरणों की सप्लाई कर रही हैं, वे कई मामलों में भारतीय कंपनियों से महंगे दाम पर बिक रहे हैं। इसलिए सस्ते सामान के जरिए बाजार बिगड़ने की आशंका फिलहाल कम है।

किन परियोजनाओं में नहीं मिलेगी एंट्री?
रिपोर्ट के मुताबिक, एचवीडीसी (HVDC) और स्टैटकॉम (STATCOM) जैसी संवेदनशील बिजली परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की एंट्री की संभावना बहुत कम है। इन परियोजनाओं में खास तरह की तकनीक, सॉफ्टवेयर और सुरक्षा से जुड़े उपकरण इस्तेमाल होते हैं। इसलिए इन प्रोजेक्ट्स में आगे भी हिताची एनर्जी, सीमेंस एनर्जी और जीई वर्नोवा जैसी कंपनियों का दबदबा बना रह सकता है।

ऑर्डर कब बढ़ सकते हैं?
पिछले कुछ महीनों में तांबा, स्टील और ट्रांसफॉर्मर ऑयल जैसी चीजों की कीमतें बढ़ने से कई सरकारी परियोजनाओं की निविदाएं टल गई थीं। अब इनकी कीमतों में कुछ नरमी आई है। ऐसे में रिपोर्ट का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 की दूसरी और तीसरी तिमाही से नए ऑर्डर मिलने की रफ्तार फिर तेज हो सकती है।

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