Udaan Desk. शेयर बाजार में ट्रेडिंग सीखने वाले ज्यादातर लोग चार्ट, कैंडलस्टिक पैटर्न, इंडिकेटर और नई-नई स्ट्रैटेजी पर सबसे ज्यादा समय लगाते हैं. उन्हें लगता है कि सही स्ट्रैटेजी मिल गई तो लगातार कमाई होने लगेगी. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें एहसास होता है कि समस्या सिर्फ स्ट्रैटेजी की नहीं है,बल्कि ट्रेडिंग साइकोलॉजी के नाम पर बहुत कुछ है जिसका असर ट्रेडिंग ओर पड़ता है. ट्रेडिंग 20% स्ट्रैटेजी और 80% साइकोलॉजी है. लेकिन ट्रेडिंग साइकोलॉजी सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि कई फैक्टर्स मिलकर इसे बनाते हैं. आइए समझने की कोशिश करते हैं.
ऐसा कई बार होता है कि एक ही स्ट्रैटेजी से दो लोग ट्रेड करते हैं. एक लगातार नियमों का पालन करता है, जबकि दूसरा बीच में स्टॉप लॉस हटा देता है, जल्दी प्रॉफिट बुक कर लेता है या नुकसान वाले ट्रेड को उम्मीद में पकड़े रहता है. यही फर्क ट्रेडिंग साइकोलॉजी का है.आसान भाषा में कहें तो ट्रेडिंग साइकोलॉजी का मतलब है, मार्केट में अनिश्चितता के बीच बिना भावनाओं के दबाव में आए अपने तय नियमों के अनुसार फैसले लेना. इसका मतलब यह नहीं कि ट्रेडर को डर या लालच महसूस नहीं होगा. फर्क सिर्फ इतना है कि उसके फैसले भावनाओं से नहीं, बल्कि उसके सिस्टम से तय होते हैं.
हर ट्रेड में प्रॉफिट नहीं होगा, इसे स्वीकार करना जरूरी है
नए ट्रेडर की सबसे बड़ी गलती यह होती है कि वह हर ट्रेड में मुनाफा चाहता है. जैसे ही ट्रेड नुकसान में जाता है, उसे लगता है कि शायद थोड़ी देर और रुकने पर वह नुकसान कवर कर लेगा, क्योंकि प्राइस वापस आ जाएगी. इसी सोच में वह स्टॉप लॉस हटा देता है या नुकसान वाले ट्रेड में एवरेज कर लेता है.
लेकिन शेयर बाजार संभावनाओं का खेल है. कोई भी स्ट्रैटेजी 100% सफल नहीं होती. अगर किसी सिस्टम की सफलता दर 60% है तो इसका मतलब है कि 100 ट्रेड में करीब 40 ट्रेड नुकसान भी देंगे. यह सामान्य बात है, न कि सिस्टम की विफलता. ट्रेडिंग में ऐसा ही होता है. जितनी जल्दी मानेंगे, उतनी जल्दी सफलता की ओर कदम बढ़ाएंगे.
अच्छा ट्रेडर नुकसान को अपनी असफलता नहीं मानता. वह उसे कारोबार का खर्च समझता है. जैसे किसी दुकान का किराया या बिजली का बिल होता है, वैसे ही स्टॉप लॉस ट्रेडिंग का एक जरूरी खर्च है. जो ट्रेडर इस बात को जल्दी समझ लेता है, वह लंबे समय तक बाजार में टिकने की संभावना बढ़ा देता है.
अनुशासन और धैर्य
अधिकांश लोग सोचते हैं कि ट्रेडिंग में सफलता का राज कोई खास इंडिकेटर या सीक्रेट स्ट्रैटेजी है. जबकि हकीकत यह है कि एक साधारण लेकिन अनुशासित सिस्टम अक्सर उस बेहतरीन स्ट्रैटेजी से बेहतर नतीजे देता है, जिसे ट्रेडर खुद ही बार-बार तोड़ देता है. अनुशासन का मतलब है कि सेटअप नहीं है तो ट्रेड नहीं करना. स्टॉप लॉस लगाया है तो उसे नहीं हटाना. दिन का नुकसान तय सीमा तक पहुंच गया है तो ट्रेडिंग बंद कर देना. इसी तरह जब लक्ष्य पूरा हो जाए तो जरूरत से ज्यादा ट्रेड करने से बचना भी अनुशासन का हिस्सा है.
धैर्य भी उतना ही जरूरी है. बाजार हर दिन मौके देता है. लेकिन नए ट्रेडर को लगता है कि अगर अभी ट्रेड नहीं किया तो बड़ा मौका निकल जाएगा. इसी डर को FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट कहा जाता है. कई बार सबसे अच्छा ट्रेड वही होता है, जो आपने किया ही नहीं.
भावनाओं से नहीं, प्रोसेस फॉलो करें
बहुत से ट्रेडर हर दिन अपने खाते का मुनाफा और नुकसान देखकर अपनी क्षमता तय करते हैं. अगर पैसा बन गया तो उन्हें लगता है कि वे अच्छे ट्रेडर हैं. नुकसान हुआ तो उन्हें लगता है कि वे ट्रेडिंग नहीं कर सकते. यह सोच गलत है. एक खराब ट्रेड भी मुनाफा दे सकता है और एक बेहतरीन ट्रेड भी नुकसान में बंद हो सकता है. इसलिए किसी एक ट्रेड का परिणाम आपकी गुणवत्ता तय नहीं करता.
हर ट्रेड के बाद खुद से सिर्फ एक सवाल पूछिए. क्या मैंने अपने सभी नियमों का पालन किया? अगर जवाब हां है, तो वह अच्छा ट्रेड था, चाहे उसमें नुकसान ही क्यों न हुआ हो. लंबे समय में वही ट्रेडर सफल होता है, जो नतीजों के बजाय अपनी प्रक्रिया को बेहतर बनाता रहता है.
पहले सिस्टम बनाइए, फिर साइकोलॉजी पर काम कीजिए
कई लोग मानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी समस्या साइकोलॉजी है. लेकिन अक्सर इसकी वजह कमजोर ट्रेडिंग सिस्टम होता है. अगर आपको खुद नहीं पता कि एंट्री कहां लेनी है, स्टॉप लॉस कितना होगा, लक्ष्य क्या होगा और एक ट्रेड में कितना जोखिम लेना है तो हर फैसले पर दिमाग में डर और उम्मीद की लड़ाई चलती रहेगी.
यही कारण है कि अनुभवी ट्रेडर सबसे पहले अपने नियम लिखते हैं. वे अपनी स्ट्रैटेजी का बैकटेस्ट करते हैं, जोखिम तय करते हैं और फिर उसी सिस्टम पर भरोसा करते हैं. जब नियम साफ होते हैं, तब फैसले लेना भी आसान हो जाता है. इसलिए ट्रेडिंग साइकोलॉजी सिर्फ मन को मजबूत बनाने का नाम नहीं है. यह एक ऐसे सिस्टम पर भरोसा करने की क्षमता है, जिसे आपने जांचा-परखा हो और जिसे आप हर स्थिति में लगातार लागू कर सकें.
ट्रेडिंग साइकोलॉजी का मतलब डर या लालच को पूरी तरह खत्म करना नहीं है. भावनाएं हर इंसान में होती हैं और ट्रेडर भी इससे अलग नहीं हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि सफल ट्रेडर भावनाओं को फैसले नहीं लेने देता.
अगर आप नुकसान स्वीकार करना सीख जाएं, हर ट्रेड को संभावना के नजरिए से देखें, अनुशासन बनाए रखें और अपने सिस्टम के अनुसार लगातार काम करें, तो आपकी ट्रेडिंग पहले से कहीं ज्यादा स्थिर हो सकती है. आखिरकार शेयर बाजार में लंबे समय तक वही टिकता है जो हर दिन सही फैसले लेने की कोशिश करता है, न कि हर दिन सही परिणाम पाने की.

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