Udaan Desk. शेयर बाजार में निवेश शुरू करना आज पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है। मोबाइल ऐप के जरिए कुछ ही मिनट में डीमैट अकाउंट खोलकर शेयर, म्यूचुअल फंड और दूसरे निवेश विकल्पों में पैसा लगाया जा सकता है। लेकिन निवेश आसान होने का मतलब यह नहीं है कि हर निवेश से कमाई तय है। बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहता है और बिना प्लान के किया गया निवेश नुकसान भी करा सकता है।
अगर आप पहली बार निवेश करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आपका निवेश क्यों है, कितना रिस्क ले सकते हैं और कितने समय तक पैसा लगाए रखना चाहते हैं। इसके साथ ही पूरे पैसे को एक जगह लगाने के बजाय डायवर्सिफिकेशन, इमरजेंसी फंड, रेगुलर निवेश और टैक्स जैसे पहलुओं को भी समझना चाहिए।
1.अपना फाइनेंशियल गोल तय करें
निवेश शुरू करने से पहले यह तय करें कि आप पैसा किस मकसद से लगा रहे हैं। क्या आपका लक्ष्य रिटायरमेंट, घर खरीदना, बच्चों की पढ़ाई, वेल्थ क्रिएशन या कोई दूसरा लंबी अवधि का फाइनेंशियल गोल है?
गोल साफ होने से यह तय करने में आसानी होती है कि आपको किस तरह का निवेश करना चाहिए और कितने समय तक पैसा लगाए रखना है।
2. कितना नुकसान सह सकते हैं?
हर निवेश में किसी न किसी स्तर का रिस्क होता है। शेयर बाजार में कीमतें तेजी से ऊपर-नीचे हो सकती हैं। इसलिए निवेश करने से पहले यह समझना जरूरी है कि आप अपने निवेश में कितनी गिरावट को बिना घबराए सह सकते हैं।
अगर आप ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं झेल सकते, तो पूरा पैसा इक्विटी में लगाने के बजाय डेट, हाइब्रिड फंड या दूसरे कम जोखिम वाले विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।
3. कम पैसे से शुरू करें
निवेश में शुरुआत करने के लिए बहुत बड़ी रकम जरूरी नहीं है। छोटी रकम से भी निवेश शुरू किया जा सकता है। असली फायदा लंबे समय तक निवेश बनाए रखने से मिलता है।
इसका सबसे बड़ा कारण कंपाउंडिंग है। इसमें आपके निवेश से मिलने वाला रिटर्न आगे चलकर खुद रिटर्न कमाने लगता है। जितना ज्यादा समय निवेश को मिलता है, उतना ही कंपाउंडिंग का असर बढ़ सकता है।
4. पूरा पैसा एक ही जगह न लगाएं
नए निवेशकों की एक आम गलती होती है कि वे अपनी पूरी रकम एक शेयर या एक ही तरह के निवेश में लगा देते हैं। अगर उस कंपनी या सेक्टर का प्रदर्शन खराब होता है, तो पूरे पोर्टफोलियो पर इसका असर पड़ सकता है।
इसलिए अलग-अलग कंपनियों, सेक्टर और एसेट क्लास में पैसा बांटना बेहतर तरीका हो सकता है। इसे डायवर्सिफिकेशन कहा जाता है।
5. पहले इमरजेंसी फंड बनाएं
शेयर बाजार में पैसा लगाने से पहले अपने रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के लिए इमरजेंसी फंड रखना भी जरूरी है।
आमतौर पर करीब 3 से 6 महीने के जरूरी खर्च के बराबर रकम आसानी से उपलब्ध जगह पर रखने की सलाह दी जाती है। इससे नौकरी जाने, अचानक बड़े खर्च या किसी दूसरी इमरजेंसी की स्थिति में बाजार गिरने के दौरान अपने निवेश को नुकसान में बेचने की जरूरत कम हो सकती है।
6. निवेश से पहले रिसर्च जरूर करें
किसी दोस्त, सोशल मीडिया पोस्ट या बाजार की अफवाह के आधार पर शेयर खरीदना जोखिम भरा हो सकता है। निवेश से पहले कंपनी का बिजनेस मॉडल, फाइनेंशियल्स, रेवेन्यू, प्रॉफिट, वैल्यूएशन और भविष्य की ग्रोथ की संभावना समझना जरूरी है।
अगर आप म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं, तो उसकी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी, पोर्टफोलियो, खर्च और पिछले प्रदर्शन को भी समझें।
7. मार्केट को टाइम करने की कोशिश न करें
नए निवेशक अक्सर यह सोचते हैं कि बाजार कब नीचे आएगा और कब ऊपर जाएगा। लेकिन बाजार की सटीक टाइमिंग करना आसान नहीं है।
इसके बजाय नियमित अंतराल पर निवेश करना ज्यादा व्यावहारिक तरीका हो सकता है। एसआईपी इसका एक लोकप्रिय उदाहरण है। बाजार ऊपर हो या नीचे, तय अंतराल पर निवेश करने से अलग-अलग कीमतों पर यूनिट खरीदने का मौका मिलता है।
8. खर्च और टैक्स को नजरअंदाज न करें
निवेश करते समय सिर्फ रिटर्न पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। ब्रोकरेज फीस, एक्सपेंस रेशियो, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी, कैपिटल गेन्स टैक्स और दूसरे चार्ज भी आपके वास्तविक रिटर्न को प्रभावित कर सकते हैं।
लंबी अवधि में छोटे-छोटे खर्च भी कुल रिटर्न पर असर डाल सकते हैं। इसलिए निवेश से पहले सभी संबंधित लागतों को समझना जरूरी है।
9. इमोशनल होकर निवेश न करें
शेयर बाजार में तेजी देखकर किसी शेयर को सिर्फ इसलिए खरीदना कि बाकी लोग खरीद रहे हैं, सही रणनीति नहीं है। इसी तरह बाजार में तेज गिरावट आने पर घबराकर निवेश बेच देना भी नुकसानदेह हो सकता है।
निवेश का फैसला अपने फाइनेंशियल गोल, रिस्क प्रोफाइल और निवेश की अवधि को ध्यान में रखकर करना चाहिए, न कि बाजार के शोर या किसी ट्रेंडिंग शेयर को देखकर।
10. समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करें
निवेश करने के बाद उसे पूरी तरह भूल जाना भी सही तरीका नहीं है। समय के साथ आपकी इनकम, फाइनेंशियल गोल और रिस्क लेने की क्षमता बदल सकती है।
इसलिए समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करें। अगर किसी एसेट क्लास में निवेश का हिस्सा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है, तो रीबैलेंसिंग के जरिए पोर्टफोलियो को दोबारा अपने लक्ष्य और रिस्क प्रोफाइल के मुताबिक लाया जा सकता है।

Related Posts
भारत में एपल पे की एंट्री : अक्टूबर से आईफोन से कर सकेंगे क्रेडिट कार्ड पेमेंट
बीएसई सेंसेक्स : टॉप 4 कंपनियों का मार्केट कैप 1.43 लाख करोड़ बढ़ा, SBI ने मारी बाजी
UPI Payment Charges पर सरकार का जवाब : UPI पूरी तरह फ्री, पेमेंट पर नहीं लगेगा ट्रांजैक्शन चार्ज