September 2, 2026

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नाम ‘जीवन रेखा’, काम यतीम बच्चों का पानी रोकने का कर दिया


• गरीब महिलाओं के रोजगारपरक प्रशिक्षण पर भी तालाबंदी
• अदालती आदेशों की अवमानना से लेकर अस्पताल संचालन में कई कमियों के हैं दोषी

भोपाल।  ‘जीवन रेखा’ नाम भर रख लेने से कोई किसी की जिंदगी की रक्षा करने वाला नहीं बन जाता। डॉक्टरी पेशे में छिपकर कोई असामाजिक गतिविधियों को भी अंजाम दे सकता है। इस बात को साबित कर रहा है, हर मरीज को राहत देने के लिए प्रतिबद्ध एक अस्पताल। यतीमखाना के कई दर्जन बच्चों का हुक्का-पानी बंद कर इस अस्पताल ने महारत हासिल की है। कदम यहां तक न रोक इसने गरीब महिलाओं के एक प्रशिक्षण स्थल को ताला जड़ दिया है। किराएदार बनकर आए इस अस्पताल की बदनीयत अब यहां की बेशकीमती जमीन पर आ टिकी है।

मामला शहर के बीच बसे दारुल शफ़क्कत से जुड़ा है। वर्ष 1928 से संचालित इस इदारे से करीब चार दर्जन से अधिक यतीम बच्चे शरण लिए हुए हैं। यहां उनके निवास और देखभाल के अलावा दुनियावी शिक्षा के साथ दीनी तालीम की भी व्यवस्था है। टेक्नीकल शिक्षा भी यह यहां पा रहे हैं। अपनी आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ वर्ष पहले दारुल शफ़क्कत ने जीवनरेखा नामक अस्पताल के संचालक डॉ. फरीद शेख को अपने आधिपत्य का एक हिस्सा अस्पताल संचालन के लिए किराए पर दे दिया था। कालांतर में यही किरायादार मालिक बनने की होड़ में लग गया है। सूत्रों का कहना है कि शुक्रवार और शनिवार की दरम्यानी रात में अस्पताल संचालक डॉ. फरीद के इशारे पर इनके मातहतों ने दारुल शफ़क्कत के एक बड़े इलाके पर ताला जड़ दिया है। इस हिस्से में मौजूद वाटर सप्लाई के साधन, पंप, हौज़ आदि स्थित हैं। इनकी राह रुकने से यतीमखाने के बच्चों के पीने, इस्तेमाल और खाना बनाने के पानी का रास्ता पूरी तरह रुक गया है। बताया जाता है कि अस्पताल संचालन की दादागिरी यह है कि उसने एक पत्र लिखकर दारुल शफ़क्कत को आगाह किया है कि उनकी जरूरत के पानी के लिए वे अस्पताल प्रबंधन से इजाजत लेकर प्राप्त कर सकते हैं।

महिलाओं के प्रशिक्षण का रास्ता भी कैद में
सूत्रों का कहना है कि दारुल शफ़क्कत द्वारा गरीब और जरूरतमंद महिलाओं के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित किया जाता है। जहां महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि सीखकर अपने और परिवार के लिए कुछ कमाई के साधन बना पाती थीं। बताया जाता है कि
जीवन रेखा अस्पताल प्रबंधन द्वारा रोके गए रास्ते से यह प्रशिक्षण केंद्र भी बाधित हो रहा है। अस्पताल प्रबंधन ने यहां अपना कबाड़ सामान समेट दिया है।

नियतखोरी का आलम
सूत्रों का कहना है कि दारुल शफ़क्कत और जीवनरेखा अस्पताल के बीच हुए किरायादारी समझौते के समय डॉ. फरीद शेख ने दारुल शफ़क्कत को पोस्ट डेटेड चेक से पेमेंट किया था। लेकिन यह चेक समय पर अनादरित नहीं हो पाए। इसको लेकर दारुल शफ़क्कत ने कानूनी कार्यवाही भी की थी। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनातनी भी चल रही है।

अंग्रेजों की तरह घुसे, कब्जा जमा लिया
दारुल शफ़क्कत को किराए का लालच देकर जीवन रेखा अस्पताल प्रबंधन ने इनके कैंपस में दखल किया। बाद में अपनी कूटनीति से इसी किराए की जगह पर कब्जा जमाने की मंशा को आकार भी दे दिया। यही नहीं मप्र वक्फ बोर्ड और दारुल शफ़क्कत के बीच चंदा निगरानी विवाद के बीच भी अस्पताल प्रबंधन ने दारुल शफ़क्कत का दामन छोड़कर मप्र वक्फ बोर्ड का दामन थाम लिया और उनसे किरायादारी कर डाली। सूत्रों का कहना है कि बोर्ड के साथ हुए समझौते के बीच भी की गईं चालाकियों का नतीजा डॉ. फरीद को कानूनी कार्यवाही से गुजरकर चुकाना पड़ा है।

इसीलिए हौसले बुलंद
सूत्रों का कहना है कि दारुल शफ़क्कत द्वारा चंदा निगरानी अदा करने में कथित तौर पर कोताही बरती गई है। जिसके चलते मप्र वक्फ बोर्ड ने संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद अलीम के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की है। हालांकि शाहिद अलीम अब संस्था से हटाए जा चुके हैं, इसलिए उनका संस्था से कोई लेनादेना नहीं है। मामला वक्फ बोर्ड और शाहिद अलीम के बीच है, संस्था का, इससे जुड़े बच्चों और प्रशिक्षण केंद्र की महिलाओं का कोई नाता नहीं है। लेकिन इस विवाद को घिरे हालात का फायदा उठाकर जीवनरेखा अस्पताल प्रबंधन अपनी मंशा पूरी करने में लगे हैं।

दांव पर बच्चों का भविष्य
शहर के लोगों का कहना है कि मप्र वक्फ बोर्ड, जीवनरेखा अस्पताल और दारुल शफ़क्कत के बीच चल रहे इस घमासान का सीधा असर यतीमखाना के बच्चों पर पड़ रहा है। हर दिन के विवाद के कारण जहां मासूम सहमे हुए हैं, वहीं उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। साथ ही वे अपने अपने भविष्य को लेकर भी आशंकित और भयभीत हैं।

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