June 22, 2026

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कुछ नया, कुछ अलग : HRV फार्मा का वर्चुअल API मॉडल बना मिसाल, बिना फैक्ट्री करोड़ों का कारोबार

हैदराबाद की एचआरवी फार्मा कुछ अलग करने की कोशिश कर रही है। कंपनी बिना किसी कारखाने के ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट (एपीआई) कारोबार खड़ा कर रही है। ऐसे उद्योग में जहां उत्पादन क्षमता का आकलन आम तौर पर रिएक्टरों, विनिर्माण इकाइयों और नियामकीय मंजूरी वाले कारखानों से किया जाता है,।

कंपनी अमेरिकी औषधि नियामक यूएसएफडीए और यूरोपीय संघ के नियामक ईयू जीएमपी की मंजूरी वाले 50 से अधिक विनिर्माण साझेदारों के साथ काम करती है। उसने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान उसकी आय में सालाना 60 से 65 फीसदी सालाना वृद्धि हुई है। वह वैश्विक स्तर पर 700 से अधिक सक्रिय ग्राहकों को अपनी सेवाएं प्रदान करती है और अगले कुछ वर्षों में 1,000 करोड़ रुपये की आय पर उसकी नजर है। वित्त वर्ष 2025 में उसने 400 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया। वित्त वर्ष 2027 तक उसकी नजर 550 करोड़ रुपये के राजस्व पर है।

यह मॉडल इस बात पर टिका है कि नियामकीय खुलासे और ग्राहक संबंध पर ध्यान देना विनिर्माण परिसंपत्तियां तैयार करने के मुकाबले अधिक मूल्यवान हो सकता है।

एचआरवी फार्मा के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी हरि किरण चेरेड्डी ने कहा, ‘हम शायद दुनिया का पहला वर्चुअल एपीआई प्लेटफॉर्म हैं। मैं इस प्रक्रिया से क्षमता का आकलन, उत्पाद और ग्राहक को नियंत्रित कैसे कर सकता हूं? आज यही संयोजन हमारे मॉडल को भारतीय फार्मा क्षेत्र अब तक देखे गए किसी भी मॉडल से बिल्कुल अलग बनाता है।’

ऐसेट-लाइट स्ट्रक्चर की वजह से एचआरवी बाहरी पूंजी जुटाए बिना भी अपना दायरा बढ़ा पाई है। चेरेड्डी ने बताया, ‘कंपनी की शुरुआत 1 लाख रुपये से हुई थी और मैंने इसमें बस उतनी ही रकम लगाई थी।’ उन्होंने दावा किया कि कंपनी पर कोई कर्ज नहीं है और उसने निजी इक्विटी निवेशकों से कोई पैसा नहीं जुटाया है।

यह विचार भारत के एपीआई उद्योग की एक ढांचागत विशेषता से उभरा है। चेरेड्डी के अनुसार, भारत में 650 से अधिक यूएसएफडीए या ईयू जीएमपी की मंजूरी वाले एपीआई विनिर्माण कारखाने हैं। इनमें से कई कारखाने काफी कम क्षमता पर चल रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत में ऐसी पर्याप्त क्षमता मौजूद है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इन संयंत्रों में से प्रत्येक में क्षमता उपयोगिता महज 50 से 55 फीसदी है।’

यह मॉडल भारत के एपीआई उद्योग में असमान क्षमता उपयोगिता की पृष्ठभूमि में उभरा है। चीन+1 रणनीति के बाद कंपनियों ने क्षमता विस्तार में भारी निवेश किया लेकिन कई उत्पादों में लाभप्रदता चीन से आने वाले कच्चे माल की कीमतों और आयात में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती है। ऐसे में कुछ कारखानों का संचालन कम क्षमता पर किया जा रहा है। इससे उन कंपनियों के लिए अवसर पैदा हुआ है जो मांग को मौजूदा क्षमता की ओर निर्देशित कर सकती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, अरविंदो फार्मा, डिवीज लैबोरेटरीज, लॉरस लैब्स, ग्रेन्यूल्स इंडिया और अन्य कंपनियों ने चीन+1 के मौकों और सरकारी प्रोत्साहन की मदद से एपीआई और इंटरमीडिएट बनाने की अपनी क्षमता बढ़ाई है। अकेले बल्क ड्रग पीएलआई स्कीम के तहत, 33 एपीआई, ड्रग इंटरमीडिएट और मुख्य शुरुआती मटीरियल से जुड़े 48 ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के लिए 32 कंपनियों को चुना गया है। इनमें दिसंबर 2025 तक कुल निवेश 4,800 करोड़ रुपये से ज्यादा हो जाएगा।

इस प्रकार एचआरवी विनिर्माण के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश करने के बजाय उत्पादों के विकास पर ध्यान देती है, ड्रग मास्टर फाइलों (डीएमएफ) का स्वामित्व रखती है, ग्राहक संबंधों का प्रबंधन करती है और मंजूरी वाले कारखानों के जरिये अनुबंध आधारित उत्पादन करती है। चेरेड्डी ने कहा, ‘फॉर्मूलेटर के लिए हम एक एपीआई कंपनी भी हैं क्योंकि हमारे पास नियामकीय दस्तावेज भी हैं। एपीआई विनिर्माण इकाई के लिए हम क्षमता एग्रीगेटर हैं क्योंकि उनके लिए हम ग्राहक बन जाते हैं।’

ग्राहक अपने नियामकीय खुलासे में एचआरवी के डीएमएफ का उल्लेख कर सकते हैं। इससे कंपनी खुद को एपीआई आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित कर सकती है जबकि उत्पादन साझेदार इकाइयों द्वारा किया जाता है।

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