खान अशु, भोपाल
एक ऐसा शायर, जिसकी कलम कश्मीर की लोकधुन से लेकर मुंबई की गलियों तक गई और जिसने फिल्मी गीतों को भी अपनी शायरी की रवानी दे दी….
राहत इंदौरी को याद कीजिए तो सबसे पहले एक जादुई आवाज़ सुनाई देती है—मुशायरे के मंच से उठती हुई, तालियों को चीरती हुई और सीधे दिल में उतरती हुई आवाज़। वह आवाज़, जिसमें मोहब्बत भी थी, बगावत भी; दर्द भी था और जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का हौसला भी।
लेकिन राहत साहब की रचनात्मक दुनिया सिर्फ मुशायरों की बेपनाह कामयाबी और हर जुबान पर चढ़े हुए मशहूर शेरों तक सीमित नहीं थी। उनकी कलम ने फिल्मों के लिए भी ऐसे गीत लिखे, जिन्हें सुनते हुए कई पीढ़ियां बड़ी हुईं—और जिनमें आज भी वही जादू मौजूद है।
सर, नाराज़, खुद्दार, नाजायज़, मैं खिलाडी तू अनाडी, दरार, करीब, हिमालय पुत्र, प्रेम अगन, द जेंटलमैन, मिशन कश्मीर, घातक, मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस., इश्क़, आरज़ू, याराना, औज़ार, मर्डर, इंतहा, मिनाक्षी: अ टेल ऑफ थ्री सिटीज़, बेगम जान और ना जाने कितनी फिल्मों में उनकी कलम अलग-अलग रंगों में दिखाई देती है।
प्रेम को उन्होंने कभी एक रंग में नहीं लिखा…
खुद्दार का “तुम सा कोई प्यारा, कोई मासूम नहीं है” सुनिए। प्रेम की बात है, लेकिन भाषा बिल्कुल सहज है। कोई भारी शब्दावली नहीं, कोई साहित्यिक प्रदर्शन नहीं—बस मोहब्बत का सीधा इज़हार। फिर नाजायज़ में “तुझे प्यार करते करते” आता है, जहां वही प्रेम जुनून और बेचैनी में बदल जाता है। इश्क़ में “नींद चुराई मेरी, किसने ओ सनम? तूने…” है—प्रेम की शरारत और शिकायत। और उसी फिल्म का “देखो देखो जानम, हम दिल अपना तेरे लिए लाए” प्रेम को एक मासूम, चंचल उत्सव में बदल देता है।
यानी एक ही शायर प्रेम को कभी मासूम बनाता है, कभी शरारती, कभी बेचैन और कभी पूरी तरह सिनेमाई।
यही फिल्मी गीतकार राहत की पहली पहचान है।
याराना का “जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा गया” राहत साहब की खिलंदड़ी कलम का खूबसूरत उदाहरण है। गीत में प्रेम है, छेड़छाड़ है, नटखटपन है और ऐसी भाषा है जो सुनते ही याद रह जाती है। माधुरी दीक्षित के शानदार नृत्य ने इसे पर्दे पर और भी जीवंत बना दिया था ….
राहत साहब समझते थे कि फिल्मी गीत केवल पढ़े नहीं जाते—वे देखे, सुने और महसूस किए जाते हैं।
इसलिए उनके शब्दों में दृश्य भी दिखाई देता है।
सीधी बात, सीधे दिल तक….आरज़ू का “अब तेरे दिल में हम आ गए… तो ….तेरे दिल में रहेंगे….तो ….तुझे अपना कहेंगे” भी इसी सादगी का उदाहरण है। यहां प्रेम किसी कठिन शेर में नहीं है। एक साधारण-सी बात को इस तरह कहा गया है कि वह करोड़ों लोगों की अपनी बात लगने लगती है।
राहत साहब जानते थे कि हर फिल्मी गीत में साहित्य का प्रदर्शन जरूरी नहीं। कभी-कभी साहित्य अपनी सबसे खूबसूरत शक्ल में तब आता है, जब वह बिल्कुल साधारण भाषा में असाधारण भावना कह दे।
राहत साहब की कलम का एक और अद्भुत रंग मिशन कश्मीर के “बूमरो बूमरो, श्याम रंग बूमरो” में दिखाई देता है। यह गीत कश्मीरी लोक-संगीत की परंपरा से जुड़ी धुन और रंग को मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा तक लेकर आया। यहां राहत साहब ने अपनी शायरी को किसी दूसरी संस्कृति पर थोपने के बजाय उसे उस मिट्टी के रंग में रंग दिया। मेहंदी, बगिया, चांद, जन्नत, दुआ—इन बिंबों के जरिए गीत में विवाह, उत्सव और कश्मीर की सांस्कृतिक खुशबू एक साथ आ जाती है।
और यही बड़ी बात है—राहत केवल शब्द नहीं जानते थे, वे शब्दों की मिट्टी पहचानते थे।
आज भी बूमरो शादियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया पर सुनाई देता है। कश्मीर की लोक-संस्कृति को लोकप्रिय सिनेमा के जरिए नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में इस गीत की बड़ी भूमिका रही है।
और फिर वही राहत करीब फिल्म में “छेती छेती मेहंदी लांवा – सोना सोना चूढ़ा पांवा” लिखते हैं। विधु विनोद चोपड़ा को गीत में पंजाबी फ्लेवर चाहिए था और राहत साहब ने पंजाबी रंग को अपनी कलम में उतार दिया। यहां उनकी भाषा बदलती है, लेकिन शायर नहीं बदलता।
कश्मीर की लोकधुन हो या पंजाब की मिट्टी—राहत साहब की कलम दोनों जगह एक सी चलती है।
यही उनकी असाधारण भाषाई संवेदना थी।
मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस. में वही कलम बिल्कुल अलग दुनिया में पहुंच जाती है।
“एम बोले तो…”
यहां न ग़ज़ल की नफासत चाहिए थी, न पारंपरिक फिल्मी भाषा। यहां चाहिए थी मुंबई की सड़क, दोस्ती की गर्मी और मुन्नाभाई का अपना अंदाज़। राहत साहब ने किरदार को अपनी भाषा नहीं दी; उन्होंने किरदार की भाषा खोजी। यही एक बड़े फिल्मी गीतकार की पहचान है। दरार का “ये प्यार प्यार क्या है, इकरार यार क्या है” भी उनकी इसी लोकप्रिय शैली का उदाहरण है। शब्दों का दोहराव यहां केवल तुकबंदी नहीं बनता, बल्कि गीत की धुन और याददाश्त का हिस्सा बन जाता है।
राहत साहब जानते थे कि कौन-सा शब्द सुनने वाले के कान में ठहरेगा और कौन-सा मिसरा गीत खत्म होने के बाद भी उसके भीतर चलता रहेगा।
राहत इंदौरी की फिल्मी यात्रा का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि उनकी कलम कई चर्चित सितारों की शुरुआती फिल्मों से जुड़ी।
अक्षय खन्ना की पहली फिल्म हिमालय पुत्र, जिसे उनके पिता विनोद खन्ना ने बनाया था, में राहत साहब के गीत थे। इसी तरह फरदीन खान की पहली फिल्म प्रेम अगन, जिसे उनके पिता फिरोज खान ने बनाया, में भी राहत इंदौरी के गीत थे… सलमान खान के बहनोई अतुल अग्निहोत्री की पहली फिल्म सर जिसमें नसीरुद्दीन शाह और परेश रावल भी थे का मशहूर गीत आज हमने दिल का हर किस्सा तमाम कर दिया …राहत साहब की कलम का कमाल था … तो वहीँ …सोहेल खान की बतौर निर्देशक पहली फिल्म औज़ार में सलमान खान पर फिल्माया गया “I Love You, I Love You, I Love You” भी राहत साहब का शाहकार था …
एक ही शायर—कभी गंभीर, कभी रोमांटिक, कभी लोकधर्मी और कभी पूरी तरह लोकप्रिय सिनेमा के मूड में।
राहत इंदौरी की लोकप्रियता केवल फिल्मों तक नहीं थी। महान ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने जब उनकी ग़ज़लों को आवाज़ दी तो राहत के शब्दों को एक अलग ही संगीतात्मक जीवन मिला।
“दोस्ती जब किसी से की जाए, दुश्मनों की भी राय ली जाए”—
रिश्तों की पेचीदगी को कितनी सहजता से कह दिया गया।
और फिर—
“लोग हर मोड़ पर रुक-रुक के संभलते क्यों हैं,
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं?”
यहां राहत साहब सिर्फ शायर नहीं, जिंदगी को देखने वाले दार्शनिक दिखाई देते हैं।
जगजीत सिंह की ठहरी हुई आवाज़ ने इन शब्दों को साहित्यिक महफिलों से निकालकर घर-घर पहुंचाया।
यानी राहत की कलम का एक चेहरा फिल्मी था, तो दूसरा ग़ज़ल का—लेकिन दोनों में एक बात समान थी: सीधे दिल तक पहुंचने की क्षमता।
नब्बे के दशक के फिल्मी गीतों में चिरंजीवी की फिल्म द जेंटलमैन का “हम अपने ग़म को सजा कर बहार कर लेंगे, तेरे हसीन तसव्वुर को प्यार कर लेंगे” राहत साहब की काव्यात्मक शक्ति का सुंदर उदाहरण है। ग़म को सजाकर बहार बना लेना—यह सिर्फ प्रेमगीत नहीं, राहत साहब की काव्य-दृष्टि है। वह उदासी को भी खूबसूरती में बदल सकते थे।
इंतहा का “ढलने लगी है रात, कोई बात कीजिए” उनकी रोमांटिक गीतकारी का एक और नायाब उदाहरण है। यहां रात केवल रात नहीं है। वह अकेलेपन का समय है। “कोई बात कीजिए” केवल आग्रह नहीं, तन्हाई से बचने की कोशिश है। यानी एक मामूली-सा वाक्य राहत की कलम में पूरा भाव-संसार बन जाता है …..बेगम जान का “मुर्शिदा”, जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है …राहत साहब का बेहद खूबसूरत गीत है।
“पहली शर्त जुदाई है, इश्क़ बड़ा हरजाई है…”
यहां राहत इंदौरी के अंदर का शायर फिल्मी गीतकार पर पूरी तरह हावी हो जाता है। इश्क़, जुदाई, तन्हाई, याद और रूहानी पुकार—“मुर्शिदा” में प्रेम एक सांसारिक भावना से आगे बढ़कर एक आध्यात्मिक तलाश बन जाता है।
राहत इंदौरी की फिल्मी यात्रा से जुड़ा एक और दिलचस्प गीत है—
“तुझे मांगा था, तुझे पाया है,
अब जाके राम पे यकीन आया है।”
यह गीत फिल्म राम-शस्त्र में इस्तेमाल हुआ, जिसमें जैकी श्रॉफ और मनीषा कोइराला प्रमुख भूमिकाओं में थे। यहां “राम” आस्था के साथ-साथ विश्वास का प्रतीक बन जाता है—प्रेम को पाने के बाद पैदा हुआ विश्वास।
राहत साहब शब्दों के अर्थ से खेलना जानते थे। एक शब्द, एक संदर्भ और पूरा भाव बदल जाता था।
खुद्दार फिल्म के गीत तुमसे कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है …. या घातक का आइटम नंबर कोई जाए तो ले आये, मेरी लाख दुआएं पाए …. या मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी के “पास वो आने लगे ज़रा ज़रा” जैसे गीतों की आज भी सोशल मिडिया रील्स पर लोकप्रियता यह बताती है कि राहत साहब के शब्द लगातार नए संदर्भों में लौटते रहते हैं।
यही किसी गीत की असली परीक्षा है।
वक्त बदल जाए, माध्यम बदल जाए, लेकिन शब्द अगर दिल में उतर गए हों तो वे लौटते रहते हैं।
राहत साहन को केवल एक फिल्मी गीतकार कहना कम होगा।
उनके फ़िल्मी गीतों में ग़ज़ल की नफासत थी, फिल्म संगीत की सरलता थी, लोकगीत की मिठास थी, पंजाबी रंग था, कश्मीरी मिट्टी की खुशबू थी और मुंबईया भाषा की जीवंतता थी।
वह बूमरो में कश्मीर की लोक-संस्कृति के साथ खड़े हो सकते थे।
छेती छेती मेहंदी लांवा में पंजाबी रंग अपना सकते थे।
एम बोले तो में मुंबई की सड़क पर उतर सकते थे।
I Love You में लोकप्रिय सिनेमा की धड़कन पकड़ सकते थे।
तुम सा कोई प्यारा में मासूम मोहब्बत लिख सकते थे।
नींद चुराई मेरी में शरारत कर सकते थे।
ये प्यार प्यार क्या है में प्रेम को लय में बदल सकते थे।
हम अपने ग़म को सजा कर बहार कर लेंगे में उदासी को सौंदर्य दे सकते थे।
ढलने लगी है रात में तन्हाई को बातचीत बना सकते थे
और मुर्शिदा में प्रेम को रूहानी तलाश में बदल सकते थे।
यही राहत इंदौरी की असली जादूगरी थी।
वह गीत नहीं लिखते थे—वह माहौल लिखते थे —वह किरदार की जुबान लिखते थे।
और सबसे बड़ी बात—
उन्होंने शायरी को कभी इतना मुश्किल नहीं होने दिया कि आम आदमी उससे दूर हो जाए। उन्होंने शायरी को महफिल से उठाया, फिल्म के पर्दे पर रखा, रेडियो से घरों तक पहुंचाया और फिर वह शायरी लोगों की आम बातचीत का हिस्सा बन गई।
11 अगस्त 2020 को राहत साहब चले गए।
लेकिन उनके फ़िल्मी गीत ज़िंदा हैं….
वह कभी भी भी लौट आते हैं, किसी कार के स्टीरियो में सुनाई देते है, किसी डांस क्लब में गूंजते हैं … किसी शादी में बूमरो बनकर थिरकते है, किसी प्रेमी की ज़ुबान पर अब तेरे दिल में हम आ गए बन जाते है और कभी किसी रील में GenZ के साथ फिर चल पड़ते है….

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