- इस्लाम में ब्याज हराम तो क्या हो करोड़ों रुपए का
- हाजियों की नेक कमाई में हो रहा ब्याज का घालमेल
खान अशु, भोपाल। पिछले दो साल से बदली हज पॉलिसी जहां हाजियों के लिए मुश्किल भरी साबित हो गई है, वहीं इससे हज कमेटी ऑफ इंडिया के लिए करोड़ों रुपए जुटाने का साधन बन गया है। महीनों पहले जमा की जाने वाली हज किश्तों से अरबों रुपए जुटाकर इस्तेमाल किया जा रहा है, बैंक ब्याज कमाया जा रहा है और इस बारे में कोई स्पष्ट हिसाब भी नहीं दिया जा रहा है। अकीदतमंदों ने हज कमेटी ऑफ इंडिया से सवाल किया है कि हर साल जमा होने वाली राशि का उपयोग कहां किया जा रहा है। उन्हें यह भी डर है कि उनकी हक हलाल की कमाई में बैंक ब्याज की लानत का घालमेल तो नहीं किया जा रहा?
हज कमेटी ऑफ इंडिया द्वारा पिछले दो सालों से महीनों पहले हज किस्त जमा करवाई जा रही है। करीब 8 पहले वसूल की जाने इस रकम से अरबों रूपए जमा किया जा रहा है। बैंक में जमा इस राशि से कमेटी को करोड़ों रुपए ब्याज हासिल हो रहा है, लेकिन इस राशि के इस्तेमाल और खर्च का हिसाब सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। इस राशि को किस मद में खर्च किया जा रहा है हज कमेटी ऑफ इंडिया इसका ब्यौरा नहीं दे पा रही है।
बैंक से मिले ब्याज का क्या इस्तेमाल?
मजहब-ए-इस्लाम में ब्याज का देना और लेना दोनों ही मना किया गया है। हज इस्लाम का एक अहम फ़रिज़ा करार दिया गया है और यह हर व्यक्ति अपनी नेक कमाई से ही पूरा करता है। हज कमेटी ऑफ इंडिया द्वारा अरबों रुपए पर ब्याज लेने से इनकार किया जाए, यह संभव नहीं है। अगर वह ब्याज नहीं ले रहे हैं तो बैंक इस ब्याज की राशि को किस मद में खर्च कर रही है। हाजियों के सफ़र में अगर इसका इस्तेमाल हो रहा है तो हाजियों की ईमानदार और नेक कमाई में ब्याज की रकम का घालमेल होने के हालात हैं।
RTI में क्या सवाल
भोपाल के एडवोकेट अनवर मुहम्मद खान ने हज कमेटी से सूचना के अधिकार के तहत इस बारे में सवाल किया है। हालांकि इस बारे में पूर्व में भी सवाल उठाए जा चुके हैं, लेकिन कमेटी के ओहदेदार और अधिकारियों द्वारा इसका जवाब देना मुनासिब नहीं समझा जाता।
इनका कहना
जर्नलिस्ट फरहान खान ने महीनों पहले मांगी जाने वाली हज किश्तों पर ऐतराज उठाया है। सीनियर जर्नलिस्ट मोहम्मद जावेद खान ने कहा कि महीनों पहले की जाने वाली राशि का उपयोग कहां किया जा रहा है, हज कमेटी ऑफ इंडिया को स्पष्ट करना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता जावेद बेग कहते हैं कि जब राशि का उपयोग हज सफ़र से महज दो माह पहले होता है तो 8 माह पहले वसूली क्यों की जा रही है। इनायत अहमद कहते हैं कि अकीदत के सफ़र को विवादों और गड़बड़ियों से दूर रखा जाना चाहिए। ऐसा करके हज कमेटी के जिम्मेदार भी सवाब के हकदार होंगे।

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