September 2, 2026

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ऐसे खत्म होता है अमीरों का कर्ज, 6.5 करोड़ में निपट गया 22 हजार करोड़ का लोन

  • बैंकों को झेलना पड़ेगा 99.9 फीसदी नुकसान

नई दिल्ली. बैंकों में जमा आम आदमी का पैसा और उनकी गाढ़ी कमाई कारोबारियों और मोटे कर्जदारों पर खुलेआम बर्बाद हो रही है. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एक हालिया मामले में 22 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा के कर्ज के मामले को महज 6.5 करोड़ रुपये में रफादफा करने की मंजूरी दे दी है. एनसीएलटी ने यह फैसला तब दिया है जबकि कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बैंकों को मोटे हेयरकट के जरिये आम आदमी के पैसों को ऐसे ही बर्बाद नहीं करना चाहिए और कर्जदारों से उसकी वसूली की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए.

ताजा मामले में एनसीएलटी ने मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के कर्ज को महज 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान पर सेटलमेंट करने की मंजूरी दे दी है. योजना को मंजूरी मिलने से कर्जदाताओं यानी बैंकों को करीब 99.97 फीसदी बकाया का नुकसान (हेयरकट) स्वीकार करना होगा.

एनसीएलटी के न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने न्यायाधिकरण के तीसरे सदस्य के रूप में मंगलवार को दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 114 के तहत निपटान योजना को मंजूरी दी. उन्होंने कर्जदाताओं की उन आपत्तियों को खारिज कर दिया, जिनमें प्रस्तावित वसूली को बेहद कम बताते हुए योजना को मंजूरी नहीं देने की मांग की गई थी.

बैंकों के विरोध को भी ठुकराया
इससे पहले एनसीएलटी की दो-सदस्यीय पीठ ने अलग-अलग राय दी थी. इसके बाद मतभेद के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया था. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की अगुवाई वाले कर्जदाताओं के समूह ने योजना को अव्यावहारिक और गैरकानूनी बताते हुए इसका विरोध किया था. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने कहा था कि करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले योजना में कर्जदाताओं को केवल 6.25 करोड़ रुपये और प्रक्रिया लागत के लिए 25 लाख रुपये देने का प्रस्ताव है.

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