June 12, 2026

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क्या 2026 में बनेंगे देश में सूखे के हालात! जानें क्यों डरा रहा है IMD का नया अलर्ट?

मानसून 2026 को लेकर मौसम विभाग (IMD) के नए अपडेट ने किसानों और इकॉनमी एक्सपर्ट्स की चिंता बढ़ा दी है. आईएमडी ने पिछले हफ्ते 2026 के मानसून पूर्वानुमान को लॉन्ग पीरियड एवरेज यानी एलपीए का 90 प्रतिशत कर दिया है. इससे पहले अप्रैल में यह अनुमान 92 प्रतिशत था. अगर यह अनुमान सच साबित होता है तो 2026 का मानसून 2015 के बाद सबसे सूखा साल माना जाएगा. एलपीए का मतलब देश भर में मानसून के दौरान होने वाली 87 सेंटीमीटर बारिश से है. यह रिपोर्ट डराने वाली जरूर है. मौसम विभाग के इस अनुमान में 5 प्रतिशत की गलती की गुंजाइश भी है.

आखिर 2015 के मानसून के साथ 2026 की तुलना क्यों की जा रही है?

आईएमडी के रिकॉर्ड के अनुसार 2015 में मानसून बहुत कमजोर था. उस साल जून से सितंबर के चार महीनों में कुल बारिश एलपीए का केवल 86 प्रतिशत थी. इससे 2014 और 2015 लगातार दो साल कम बारिश वाले साल बन गए थे. मौसम विभाग के 115 साल के रिकॉर्ड में ऐसा केवल चौथी बार हुआ था. इससे पहले 1904 और 1905 में ऐसा हुआ था. फिर 1965 और 1966 में भी सूखे जैसे हालात बने थे. इसके बाद 1986 और 1987 में भी लगातार दो साल कम बारिश हुई थी. अब 2026 में भी सूखे का डर सता रहा है.

आईएमडी का नया अनुमान इसी ओर इशारा करता है. 2015 में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत काफी अच्छी थी. जून के महीने में सामान्य से 16 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई थी. लेकिन इसके बाद अचानक बारिश की रफ्तार कम हो गई.

जुलाई 2015 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 16 प्रतिशत नीचे चला गया. यह स्थिति अगस्त में और खराब हो गई और बारिश 22 प्रतिशत कम रही. सितंबर आते-आते बारिश में कमी का यह आंकड़ा 24 प्रतिशत तक पहुंच गया. फिर भी जून की अच्छी बारिश के कारण शुरुआती दो महीनों में कुल कमी केवल 4 प्रतिशत ही रही थी.

क्यों अल नीनो के कारण मानसून का ब्रेक सबसे बड़ा खतरा बन जाता है?

मौसम अधिकारी बताते हैं कि अल नीनो वाले साल में केवल बारिश की मात्रा कम नहीं होती है. ऐसे साल में मानसून का ब्रेक भी सामान्य से काफी लंबा हो जाता है. मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज के पूर्व सचिव और मानसून एक्सपर्ट माधवन राजीवन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘आमतौर पर एक सामान्य मानसून साल में 7-8 दिनों का ब्रेक होता है’. राजीवन ने आगे बताया, ‘लेकिन अल नीनो वाले साल में ये ब्रेक अक्सर लंबे होते हैं. यह ब्रेक 15-20 दिनों का भी हो सकता है और किसी खास इलाके में 25 दिनों तक जा सकता है’.

राजीवन का कहना है कि आईएमडी लगभग 60 प्रतिशत कम बारिश की आशंका जता रहा है. इसका मतलब है कि इस साल मानसून के खराब होने की बहुत अधिक संभावना बन रही है. हमें अभी यह नहीं पता कि बारिश का बंटवारा कैसा होगा और यह कितनी समान रूप से फैलेगी.

कहां के किसानों को बारिश की कमी से सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा?

आमतौर पर अल नीनो वाले साल में मध्य भारत में हालात मुश्किल होते हैं. प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्सों और दक्षिणी प्रायद्वीप में भी मानसून का मौसम काफी कठिन रहता है. राजीवन के अनुसार, ‘पूर्वोत्तर में अच्छी बारिश होगी, जहां हम कुछ बाढ़ की भी उम्मीद कर सकते हैं’.

इस साल अल नीनो के कारण मानसून का ब्रेक ज्यादा लंबा होने की संभावना है. 2026 के मानसून में मुश्किल मौसम के संकेत एकदम साफ दिखाई दे रहे हैं. लेकिन 2015 के अनुभव बताते हैं कि इसका असर पूरे भारत में एक जैसा बिल्कुल नहीं होगा. कुछ इलाकों में बारिश अच्छी होगी, तो कहीं हालात बहुत ज्यादा खराब होंगे.

हमारा पूरा फोकस अब उन खास इलाकों पर होना चाहिए जहां बारिश कम होगी. खासकर उन छोटे किसानों पर ध्यान देना जरूरी है जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं. ये किसान अपनी छोटी जमीन पर केवल एक या दो फसलें ही उगा पाते हैं. इन किसानों के लिए बारिश की कमी एक जीवन और मौत का सवाल बन जाती है.

क्या मानसून कमजोर होने से हमारी ग्रामीण इकॉनमी पर बड़ा संकट आएगा?

मानसून का सीधा असर हमारी खेती और ग्रामीण इकॉनमी पर होता है. राजीवन इस बात को बहुत ही आसान शब्दों में समझाते हैं. राजीवन ने कहा, ‘मूल रूप से हम हमेशा पूरे भारत में चावल के उत्पादन आदि के बारे में बात करते हैं’. उनका कहना है कि नेशनल लेवल पर शायद उत्पादन ज्यादा न गिरे. लेकिन लोकल लेवल पर छोटे किसानों के लिए हालात बेहद खराब हो सकते हैं.

कुल मिलाकर देश की जीडीपी पर कोई बहुत बड़ा नकारात्मक असर शायद न दिखे. लेकिन एक अल नीनो साल में लोकल असर बहुत बड़ा हो सकता है. हमें इस लोकल और जमीनी असर को लेकर बहुत सावधान रहने की जरूरत है. एग्रीगेट नंबर्स या बड़े आंकड़ों में ये छोटे लेकिन महत्वपूर्ण लोकल असर अक्सर छिप जाते हैं. यही लोकल असर यह तय करेंगे कि वित्तीय वर्ष 2027 के बाकी हिस्से में ग्रामीण भारत का हाल कैसा रहेगा. छोटे किसानों की मुश्किलें ही असल ग्रामीण संकट की असली तस्वीर पेश करेंगी. सरकार को समय रहते इन किसानों के लिए बेहतर पॉलिसी बनानी होगी.

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