स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय Stanford University के विशेषज्ञों के अध्ययन में सामने आया है कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का लगातार इस्तेमाल दिमाग को “डोपामाइन” नाम के केमिकल का आदी बना रहा है। जब कोई व्यक्ति बार-बार सोशल मीडिया स्क्रॉल करता है या हर नोटिफिकेशन चेक करता है, तो दिमाग को छोटी-छोटी खुशी महसूस होती है। धीरे-धीरे दिमाग इसी तेज उत्तेजना का आदी बन जाता है। रिसर्च के मुताबिक, लगातार फोन इस्तेमाल करने से पढ़ाई, काम या सामान्य गतिविधियां उबाऊ लगने लगती हैं। वजह यह है कि इन कामों में स्मार्टफोन जैसी तुरंत खुशी नहीं मिलती। इसका असर ध्यान, एकाग्रता और फैसले लेने की क्षमता पर पड़ता है।
14 दिन का डिजिटल ब्रेक दिखा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी दिमाग में “प्लास्टिसिटी” होती है, यानी दिमाग खुद को दोबारा बेहतर बना सकता है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम करे और ऐसी गतिविधियों में खुशी ढूंढे जो कम उत्तेजना वाली हों, जैसे किताब पढ़ना, टहलना, संगीत सुनना या परिवार के साथ समय बिताना।हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) और PNAS Nexus से जुड़े एक अध्ययन में 467 लोगों को शामिल किया गया। इन लोगों ने दो हफ्तों तक फोन पर इंटरनेट बंद रखा। केवल कॉल और मैसेज की अनुमति थी। स्टडी में पाया गया कि :-
1. ध्यान और एकाग्रता बढ़ी
2. चिंता और तनाव कम हुआ
3. नींद बेहतर हुई
4. अवसाद के लक्षण घटे
नींद और फोन का गहरा रिश्ता
विशेषज्ञों के अनुसार खराब नींद अगले दिन इंसान को और ज्यादा फोन इस्तेमाल करने की तरफ धकेलती है। लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता।
यह उपाय अपनाएं
1. नोटिफिकेशन कम करें
2. सोने से पहले फोन दूर रखें
3. सोशल मीडिया से छोटे-छोटे ब्रेक लें
4. स्क्रीन टाइम ट्रैक करें
5. जरूरत पड़े तो विशेषज्ञ की मदद लें
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि सही आदतें और रणनीति ही इस लत से बाहर निकाल सकती हैं।

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