June 26, 2026

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युवा संत विजय नंदन ने उठाए रेलवे किराया प्रणाली पर गंभीर सवाल, पूछा-अब तक जांच क्यों नहीं?

2024 और 2026 में बुकिंग क्लर्क को चेतावनी, फिर भी व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं?
मध्य प्रदेश के सिवनी निवासी और बुधनी विधानसभा से mp के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले युवा संत विजय नंदन ने भारतीय रेलवे की किराया निर्धारण प्रणाली तथा शिकायत निवारण प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि एक जैसी त्रुटियाँ वर्षों बाद भी दोहराई जा रही हैं, तो केवल संबंधित कर्मचारी को चेतावनी देना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या प्रणालीगत सुधार की आवश्यकता है।

विजय नंदन द्वारा उपलब्ध कराए गए आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, नागपुर मंडल की जांच में यह दर्ज किया गया कि टिकट जारी करते समय बुकिंग क्लर्क द्वारा गलत किराया श्रेणी का चयन किया गया, जिसके कारण अधिक किराया वसूला गया। रेलवे ने संबंधित कर्मचारी को चेतावनी जारी कर भविष्य में नियमों के अनुसार टिकट जारी करने के निर्देश दिए।

इसके बाद वर्ष 2026 में एक अन्य शिकायत पर जारी पत्र में भी रेलवे ने उल्लेख किया कि टिकट जारी करते समय गलत किराया श्रेणी के चयन के कारण अधिक किराया वसूला गया और संबंधित कर्मचारी को चेतावनी दी गई।

हालाँकि, इसी विषय पर शिकायत संख्या MORLY/E/2026/0024818 के निस्तारण में रेलवे ने शिकायत को “No Merit” बताते हुए बंद कर दिया। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस उत्तर में उनके मुख्य प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया।

विजय नंदन का कहना है कि उन्होंने बार-बार केवल यह जानकारी माँगी कि यदि किसी मार्ग पर वास्तविक यात्रा Passenger Train से होती है, तो Express अथवा Superfast श्रेणी का किराया किस Rule Number, Railway Board Circular, Commercial Instruction, Fare Table या वैधानिक प्रावधान के आधार पर लिया जाता है। उनके अनुसार आज तक संबंधित नियम का स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं कराया गया।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि अलग-अलग वर्षों में रेलवे स्वयं टिकट जारी करने में त्रुटि स्वीकार कर संबंधित कर्मचारी को चेतावनी देता है, तो यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या केवल चेतावनी देना पर्याप्त है, या फिर टिकटिंग प्रणाली, किराया निर्धारण प्रक्रिया और शिकायत निवारण तंत्र की भी स्वतंत्र समीक्षा की जानी चाहिए ताकि ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
विजय नंदन ने इस पूरे प्रकरण को रेलवे यात्रियों के अधिकार, प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा विषय बताते हुए Director of Public Grievances (Cabinet Secretariat), Railway Board, प्रधानमंत्री कार्यालय तथा अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष स्वतंत्र उच्चस्तरीय समीक्षा की मांग करने की बात कही है।

प्रशासनिक कानून के विशेषज्ञों का मत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा दिए जाने वाले आदेश कारणयुक्त (Speaking Orders) होने चाहिए और नागरिकों को निर्णय का विधिक आधार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या रेलवे बोर्ड अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी इस मामले में उपलब्ध अभिलेखों की स्वतंत्र समीक्षा करते हैं, यह स्पष्ट करते हैं कि विवादित किराया किन नियमों के आधार पर निर्धारित किया गया था, और यह भी जांचते हैं कि क्या शिकायतों के निस्तारण में सभी उपलब्ध दस्तावेजों पर समुचित विचार किया गया।

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