June 19, 2026

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भोपाल में वाहन चेकिंग पॉइंट बनाम ठोस कानून : क्या वाकई सड़कों पर पहरेदारी से थमेगा अपराध?

  • पूर्व डीआईजी का फरमान सही था या कमिश्नरी के नए आदेश

खान अशु, ​भोपाल
राजधानी में कानून व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। बहस का मुख्य मुद्दा है-शहर के चौराहों पर लगने वाले भारी-भरकम ‘वाहन चेकिंग पॉइंट’। एक तरफ जहां कुछ समय पहले तक पुलिस प्रशासन का मानना था कि सड़कों पर बेवजह की चेकिंग से जनता परेशान होती है, वहीं अब शहर की रणनीति बिल्कुल उलट नजर आ रही है।

​अतीत और वर्तमान: दो अलग-अलग रणनीतियां

​भोपाल की कानून व्यवस्था में पिछले कुछ सालों में दो बेहद अलग दृष्टिकोण देखने को मिले हैं:

​इरशाद वली (तत्कालीन आईजी) का दृष्टिकोण : अपने कार्यकाल के दौरान तत्कालीन भोपाल आईजी इरशाद वली ने शहर की सड़कों पर होने वाली रूटीन वाहन चेकिंग को बंद करने के कड़े आदेश जारी किए थे। उनका मानना था कि सड़कों पर गाड़ियां रोककर कागजात जांचने से आम नागरिकों को बेवजह की मानसिक और शारीरिक परेशानी होती है, ट्रैफिक जाम लगता है और पुलिस का ध्यान मुख्य अपराधों से भटकता है। उन्होंने ‘विजिबल पुलिसिंग’ (पुलिस की मौजूदगी) और खुफिया तंत्र पर ज्यादा जोर दिया था।

वर्तमान पुलिस कमिश्नर प्रणाली का रुख : इसके विपरीत, वर्तमान पुलिस कमिश्नरी सिस्टम के तहत शहर के लगभग हर प्रमुख चौराहे और एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स पर कड़े ‘चेकिंग पॉइंट’ (बैरिकेट्स) लगा दिए गए हैं। पुलिस का तर्क है कि इससे संदिग्धों की आवाजाही पर रोक लगती है और अपराधियों में डर पैदा होता है।

​अपराध ग्राफ और नागरिकों की परेशानी

दावों से इतर, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आंकड़ों और स्थानीय निवासियों के अनुभव बताते हैं कि इन चेकिंग पॉइंट्स के बावजूद अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में ग्राफ बढ़ा ही है। जहां पीक ऑवर्स (दफ्तर और स्कूल के समय) में चेकिंग के कारण लंबे ट्रैफिक जाम लगते हैं। एम्बुलेंस जैसी आपातकालीन गाड़ियां भी कई बार बैरिकेट्स में फंस जाती हैं।

वहीं सड़कों पर पुलिस खड़ी होने के बावजूद गलियों में चेन स्नैचिंग, सूने मकानों में चोरियां और देर रात की चाकूबाजी की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। नशीले पदार्थों की खरीद बिक्री भी जोरों पर है। अपराधी मुख्य सड़कों के बजाय वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल कर निकल जाते हैं। इससे पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ हेलमेट, तीन सवारी और गाड़ी के कागजात चेक करने में व्यस्त रहता है, जिससे गंभीर अपराधों की तफ्तीश और गश्त प्रभावित होती है।

चेकिंग पॉइंट जरूरी या ठोस कानून?

विशेषज्ञों और आम जनता के बीच अब यह सवाल बड़ा हो गया है कि अपराध रोकने का सही तरीका क्या है? क्या सड़कों को ब्लॉक करना काफी है या हमें सिस्टम में गहरे सुधार की जरूरत है?

वरिष्ठ पत्रकार फरहान खान कहते हैं कि सड़कों पर चेकिंग केवल ‘निवारक’ कदम हो सकती है, वह भी बेहद सीमित। इससे केवल वही अपराधी पकड़े जा सकते हैं जो अनजाने में उस रास्ते पर आ जाएं। पेशेवर अपराधी इन पॉइंट्स से बचना बखूबी जानते हैं। यह व्यवस्था कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों के लिए ज्यादा असुविधाजनक साबित होती है। सेवानिवृत्त एसीपी नागेन्द्र पटैरिया का मानना है कि अपराध को जड़ से खत्म करने के लिए नाकों पर खड़े होने के बजाय ‘स्मार्ट और सख्त’ रवैये की जरूरत है। वे कहते हैं कि कानून का डर तब पैदा होता है, जब अपराधी को पता हो कि वह बचेगा नहीं। इसके लिए मजबूत इन्वेस्टिगेशन (जांच) और कोर्ट में ठोस पैरवी की जरूरत है ताकि सजा की दर बढ़े। इस मामले को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक बुंदेले कहते हैं कि सड़कों पर इंसानों को खड़ा करने के बजाय AI-इनेबल्ड CCTV कैमरे, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल होना चाहिए। इससे बिना ट्रैफिक रोके संदिग्ध गाड़ियों को ट्रैक किया जा सकता है।

उनका कहना है कि मुख्य सड़कों पर बैरिकेड लगाने से ज्यादा जरूरी है कि पुलिस पीसीआर और चीता मोबाइल रात के समय कॉलोनियों और अंदरूनी रास्तों पर गश्त करें, जहां असल में वारदातें होती हैं।

सुरक्षा भी चाहिए, सम्मान भी

शहर की जनता का कहना है कि सड़कों पर बैरिकेट्स लगाकर हर नागरिक को संदिग्ध नजर से देखना और ट्रैफिक में परेशान करना सुरक्षा का स्थाई समाधान नहीं है। वे कहते हैं कि सरकार और पुलिस प्रशासन को तत्कालीन आईजी इरशाद वली के ‘नागरिक-अनुकूल’ नजरिए और वर्तमान सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच एक संतुलन बनाना होगा। अपराध तब रुकेंगे जब पुलिस का खुफिया तंत्र मजबूत होगा, कानून का शिकंजा कड़ा होगा और न्याय प्रक्रिया तेज होगी, न कि सिर्फ चौराहों पर चालान काटने से।

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